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जुवेनाइल जस्टिस एक्ट के कारण हाथ बंधे हैं नहीं तो फांसी की सजा सुनाता, जज की कड़ी टिप्पणी

Thu, 20 Sep 2018 05:12 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, हिसार
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दोषी ने ऐसी हरकत की है जिसके बारे में कोई सोच भी नहीं सकता। ऐसे जघन्य अपराध करने वालों को सख्त से सख्त सजा मिलनी चाहिए। जुवेनाइल जस्टिस एक्ट की धारा 21 के राइडर के कारण हाथ बंधे हैं नहीं तो दोषी को फांसी की सजा सुनाते। 
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यह टिप्पणी की है अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश डीआर चालिया ने। माननीय जज बीते साल दिसंबर माह में उकलाना की छह साल की बच्ची से दरिंदगी के बाद हत्या करने वाले दोषी को बुधवार को सजा सुना रहे थे। 

चिल्ड्रन स्पेशल कोर्ट ने दोषी को 20 साल की कैद की सजा और 80 हजार रुपये का जुर्माना लगाया है। वारदात के समय दोषी की उम्र 17 साल 9 महीने थी। अब उसकी उम्र 18 साल से अधिक है। 
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बता दें कि छह साल की मासूम बच्ची से दिल्ली की निर्भया की तरह ही दरिंदगी की गई थी। रेप के बाद बच्ची के निजी अंगों में कांटेदार लकड़ी डाल दी थी। करीब 12 इंच तक लकड़ी बच्ची के शरीर के अंदर चली गई थी, जिससे उसकी आंत और गर्भाशय फट गया था। अत्यधिक खून बहने के कारण मासूम की मौत हो गई थी।

अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश डीआर चालिया ने सजा सुनाते हुए कहा कि ऐसे जघन्य अपराध करने वालों को सख्त से सख्त सजा मिलनी चाहिए, ताकि अपराधियों में कानून का भय पैदा हो। 

उन्होंने कहा कि दोषी की उम्र वारदात के समय 18 साल से कम होने के कारण जुवेनाइल जस्टिस एक्ट की धारा 21 के राइडर के कारण फांसी की सजा नहीं दे सकते, इसलिए जरूरी है कि दोषी को ज्यादा से ज्यादा सजा मिले। दोषी को 20 साल की सजा काटनी होगी। सरकार या प्रशासन इस सजा को कम नहीं कर सकता। 

इन धाराओं में दोषी साबित
दोषी को आईपीसी की धारा 302, 376, 201, 363, 366, 450 पोक्सो एक्ट व एससी एसटी एक्ट के तहत दोषी करार दिया गया है। दोषी अब साढ़े अठारह साल का है। कोर्ट ने 14 सितंबर को आरोपी को दोषी करार दिया था।

निर्भया प्रकरण के बाद बने कानून के कारण 20 साल की कैद

निर्भया कांड के बाद कानून में संशोधन किया गया था कि अगर कोई नाबालिग हिंसक अपराध में शामिल है तो उसका जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड की तरफ से दिमागी परीक्षण के बाद वयस्क की तरह केस ट्रायल करके सजा दी जाए।

जेजे बोर्ड की रिपोर्ट के बाद आरोपी नाबालिग को दिमागी वयस्क मानते हुए उस पर चिल्ड्रन स्पेशल कोर्ट में केस चलाया जा रहा था। अगर निर्भया कांड के बाद कानून में संशोधन नहीं हुआ होता दो दोषी को अधिकतम तीन साल की सजा मिलती। 

ऐसा कृत्य किया, जिसके बारे में कोई सोच भी नहीं सकता
न्यायाधीश एडीजे डीआर चालिया ने मामले को ‘दुर्लभतम में दुर्लभ’ माना। साथ ही कहा कि जुवेनाइल जस्टिस एक्ट (जेजे एक्ट) की धारा 21 में लगे राइडर के कारण जुवेनाइल-इन-कनफ्लिक्ट इन लॉ (कानून के साथ संघर्ष में किशोर) को मृत्युदंड और बायॉलोजिकल आजीवन कारावास की सजा नहीं सुनाई जा सकती। न्यायाधीश ने कहा कि इस मामले में किशोर ने ऐसा कृत्य किया, जिसके बारे में कोई सोच भी नहीं सकता।
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यह था मामला

बीते साल की आठ दिसंबर की रात को सपेरा समुदाय की बस्ती से करीब छह वर्षीय मासूम का अपहरण कर लिया गया। मासूम अपनी मां के साथ सोई हुई थी। सुबह उसका शव बस्ती के साथ ही एक खाल क्वार्टर में मिला था।

पोस्टमार्टम रिपोर्ट में खुलासा हुआ था कि बालिका के नाजुक अंग में आरोपी ने लकड़ी डाली थी, जिससे उसकी आंतें व अन्य अंग क्षतिग्रस्त हो गए और अधिक खून बहने से उसकी मौत हो गई। इस बारे में पुलिस ने 8 दिसंबर, 2017 को दुष्कर्म और हत्या का केस दर्ज किया था।
 
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