चंडीगढ़। पीजीआई में हड़ताल करने पर जारी नोटिस पर रेजिडेंट डॉक्टर एसोसिएशन (एआरडी) ने सोमवार को अपना जवाब दाखिल कर दिया। इसमें 15 अक्तूबर को की गई हड़ताल को उचित ठहराते हुए एआरडी ने कहा कि कार्यस्थल पर उनकी सुरक्षा सुप्रीम कोर्ट की ओर से दिया गया एक मौलिक अधिकार है इसलिए उनका फैसला उचित था। पीजीआई के निदेशक प्रोफेसर विवेक लाल की ओर से 18 अक्तूबर को एआरडी को भेजे गए कारण बताओ नोटिस में हड़ताल बुलाने के एआरडी के फैसले को सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवमानना बताया गया था। 15 अक्तूबर को एसोसिएशन ने कोलकाता में प्रदर्शन कर रहे डॉक्टरों के साथ एकजुटता दिखाने के लिए ओपीडी और वैकल्पिक सेवाएं बंद कर दी थीं। यह मामला इसलिए भी गंभीर था क्योंकि 7 अक्तूबर को एक मरीज के तीमारदार की ओर से डॉक्टर के साथ कथित तौर पर मारपीट के बाद मेडिकल इमरजेंसी को तीन घंटे के लिए नए मरीजों के लिए बंद कर दिया गया था। नोटिस के जवाब में एआरडी ने पीजीआई में हिंसा और मारपीट की हाल की घटनाओं का जिक्र किया है। साथ ही कहा है कि सुप्रीम कोर्ट ने एक राष्ट्रीय टास्क फोर्स का गठन किया था जिसमें स्वास्थ्य सेवा पेशेवरों की सुरक्षा सहित महत्वपूर्ण मुद्दों पर स्पष्ट दिशा-निर्देश और समयसीमा तय की गई थी। दुर्भाग्य से उन निर्देशों का आंशिक रूप से ही क्रियान्वयन किया गया है जिसके परिणामस्वरूप डॉक्टरों के साथ बार-बार हिंसक घटनाएं हो रही हैं। एआरडी का कहना है कि उनकी हड़ताल से मरीजों की देखभाल प्रभावित नहीं हुई क्योंकि आउटसोर्स कर्मचारियों की हड़ताल के कारण सेवाएं पहले ही प्रभावित थीं। उस दौरान कई रेजिडेंट जो वैकल्पिक ओटी, ओपीडी में तैनात थे, वे पहले से ही बाधित वैकल्पिक चिकित्सा सेवाओं को और अधिक बाधित किए बिना प्रतीकात्मक भूख हड़ताल में भाग लेने में सक्षम थे। इसके अलावा वार्डों और प्रयोगशालाओं के सुचारू संचालन को सुनिश्चित करने के लिए उन क्षेत्रों में तैनात रेजिडेंट ने केवल दोपहर के भोजन के अवकाश और ड्यूटी के घंटों के दौरान ही सांकेतिक भूख हड़ताल में भाग लिया।