सुषमा स्वराज जब पाकिस्तान गई थीं तो उन्होंने वहां अपना घर ढूंढने की कोशिश की थी। उन्होंने लाहौर में उर्दू में ऐसा भाषण दिया था कि सब सुनते रह गए। पूर्व विदेश मंत्री और प्रखर वक्ता सुषमा स्वराज न केवल देश में बल्कि विदेशी मुल्कों के लोगों के दिलों पर भी राज करतीं थीं। यही कारण है कि आज दुनियाभर के लोग उन्हें श्रद्धांजलि दे रहे हैं।
एक मौका था पाकिस्तान में भारत-पाक की ज्वॉइंट असेंबली में जब वहीं के 25 सांसदों ने अंग्रेजी में अपनी बात रखी, लेकिन सुषमा स्वराज ने उर्दू में अपनी बात रख कर सभी का दिल जीत लिया था। वहां मौजूद पाकिस्तानी सांसदों को यकीन नहीं हुआ तो वह उनकी डेस्क पर जाकर देख रहे थे कि कहीं सुषमा किसी से लिखवाकर तो नहीं लाईं हैं। कुछ ऐसी ही हस्ती थीं सुषमा स्वराज।
जहां जाती थीं लोगों के दिलों पर एक छाप छोड़कर आतीं थीं। सुषमा स्वराज के सबसे करीबी माने जाने वाले पूर्व सांसद सत्यपाल जैन ने अमर उजाला से वर्ष 1998 भारत-पाक ज्वाइंट असेंबली की यादें साझा कीं। उन्होंने बताया कि सुषमा स्वराज और उन्होंने पंजाब यूनिवर्सिटी से पढ़ाई की है। वे उन्हें सत्यपाल कह कर पुकारती थीं और वह बहन जी। उस पल को याद कर वो भावुक हो गए।
सत्यपाल जैन ने बताया कि वर्ष 1998 में 25 सांसदों का पार्लियामेंट्री डेलिगेशन लाहौर गया था। इस दौरान भारत के 25 सांसद और पाकिस्तान के 25 सांसदों की एक ज्वाइंट असेंबली हुई। पहले पाक सांसदों ने अपना भाषण दिया, सभी अंग्रेजी में बोले। जब भारतीय सांसदों की बारी आई तो सुषमा स्वराज ने पूरा भाषण उर्दू में देकर सभी को चौंका दिया।
पाकिस्तान के कुछ सांसदों को विश्वास नहीं हुआ। भाषण के खत्म होने के बाद एक सांसद उनके डेस्क पर यह देखने के लिए पहुंचा कि सुषमा स्वराज को किसी ने लिखकर तो नहीं दिया। सभी उनकी भाषा शैली को सुनकर चकित थे। तालियों की गड़गड़ाहट से पूरी असेंबली गूंज उठा। इस पूरे वाक्ये के बाद सुषमा ने उस सांसद को कहा कि भारत में आज भी उर्दू बोली जाती है।
पाक गए तो बोलीं- चलो मेरा घर ढूंढते हैं
सत्यपाल जैन ने बताया कि सुषमा स्वराज सालों बाद भी अपनों को नहीं भूली थीं। इसका एक उदाहरण पाकिस्तान में देखने को मिला। लाहौर जाने के बाद सुषमा ने कहा कि दादा व दादी पाकिस्तान के लाहौर में रहते थे। बंटवारे के दौरान 14 अगस्त को उनके दादा का कत्ल कर दिया गया था।
दादी ने घर के आंगन में ही लकड़ियां एकत्रित कर उनका संस्कार किया और सुबह 4 बजे अस्थियां लेकर निकल पड़ी और रास्ते में सतलुज नदीं में अस्थियां प्रवाहित कीं। सुषमा ने कहा- मेरे दादा-दादी का घर धर्मपुरा में है, चलो ढूंढते हैं। दोनों एक पीएसओ को लेकर धर्मपुरा की गलियों में काफी घूमे।
दोनों बिना किसी सिक्योरिटी के निडर होकर पाक की गलियों में घूमती रहीं। सुषमा स्वराज को जैसा बताया गया था उसके आधार पर उन्हें घर का थोड़ा हुलिया याद था, जिसकी वजह से उन्होंने अपना घर ढूंढा।
एक साथ पढ़ाई की, साथ ही संसद भी पहुंचे
सुषमा स्वराज और सत्यपाल जैन ने पंजाब यूनिवर्सिटी से पढ़ाई की है। जैन ने बताया कि पहली बार उनकी मुलाकात 1973 में हुई। उस वक्त सुषमा पीयू से लॉ की पढ़ाई कर रहीं थीं और वह एमए कर रहे थे। वर्ष 1996 में दोनों एक साथ संसद पहुंचे। सुषमा दिल्ली से जीत कर आईं थीं और जैन चंडीगढ़ से। सूचना और प्रसारण मंत्री बनने के बाद चंडीगढ़ का दूरदर्शन केंद्र भी उन्हीं की देन हैं।
दूसरी बार वर्ष 1998 में भी एक साथ ही संसद पहुंचे। जैन ने बताया कि सुषमा ने जहां से भी चुनाव लड़ा, वह नामिनेशन भरने के समय मौजूद रहे। वह भी हर चुनाव में मदद करने पहुंचीं। जैन ने बताया कि सुषमा स्वराज उन्हें सिर्फ सत्यपाल कहकर पुकारती थीं और वह बहन जी। 45 साल का रिश्ता, कभी न भूलने वाला रिश्ता बन गया है।