कई अड़चनें आईं, विरोधियों ने रोड़े अटकाए, पर सुषमा स्वराज अपने रास्ते से डिगी नहीं और सियासत की बुलंदियों पर पहुंची। उनमें राजनीति का जुनून ही कुछ ऐसा था कि हर बाधा पस्त हो जाती थी। पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के संबंध पक्ष और विपक्ष दोनों नेताओं से हमेशा मधुर रहे। वे अपने कामकाज में कभी पक्षपात को हावी नहीं होने देती थी।
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लेकिन कम उम्र में उनकी कामयाबी उनके कुछ सियासी विरोधियों के गले नहीं उतर रही थी। उनका सियासी सफर शुरू होते ही विरोधियों ने उनकी राह में रोड़े अटकाने शुरू कर दिए थे। हरियाणा में 1977 में पहली बार विधायक बनने केबाद सुषमा स्वराज का सबसे कम उम्र की कैबिनेट मंत्री बन जाना उनके विरोधियों को अखर रहा था।
लेकिन इन विरोधियों से कैसे निपटना है, इसका गुर भी सुषमा स्वराज बखूबी जानती थी। अपनी कूटनीतिक कुशलता के बूते ही सुषमा ने इन्ही विरोधियों को मात दे अपने सियासी सफर को बुलंदियों तक पहुंचाया। सुषमा स्वराज जब हरियाणा में सबसे कम उम्र की मंत्री बने तो अंदरूनी राजनीति का शिकार हो गई। तत्कालीन मुख्यमंत्री देवीलाल पर उनके समर्थक नेताओं का दबाव इतना ज्यादा बढ़ गया कि उन्हे सुषमा स्वराज को मंत्रीमंडल से बाहर करना पड़ा।
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सन 1977 में हरियाणा में जनता पार्टी की सरकार पूर्ण बहुमत के साथ बनी। जनता पार्टी में कुल छह दल शामिल थे। जनता पार्टी और लोकदल मुख्य दल थे। अब मंत्रीमंडल का गठन होना था। सुषमा अपनी काबिलियत के बूते और राजनीतिक पैठ के चलते महज 25 वर्ष की उम्र में इस मंत्रीमंडल का हिस्सा बनने में कामयाब रही।
हालांकि सुषमा के विरोधी उनके मंत्री बनने का विरोध कर रहे थे, लेकिन जनता पार्टी की राष्ट्रीय इकाई का दबाव इतना ज्यादा था कि देवीलाल को सुषमा को मंत्री बनाना पड़ा। सुषमा मंत्री तो बन गई। मगर नवंबर 1977 में विरोधी इस कदर हावी हो गए कि उन्होंने सुषमा को मंत्रीमंडल से हटाने की लॉबिंग शुरू कर दी।
अंतत: विरोधी कामयाब हुए और अचानक सुषमा स्वराज को कैबिनेट से हटाने का फरमान जारी हो गया। सुषमा स्वराज को क्यों हटाया गया, इसके पीछे तत्कालीन देवीलाल सरकार ने कोई स्पष्ट वजह नहीं बताई। सुषमा ने सरकार से उन्हे मंत्रीमंडल से हटाने का कारण जानना चाहा, मगर उन्हे कोई संतोषजनक जवाब नहीं दिया गया। जिस पर सुषमा ने इसकी शिकायत जनता पार्टी के अध्यक्ष चंद्रशेखर से की।
उधर, सुषमा जार्ज फर्नांडीस की भी गुड बुक में थी। जनता पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व ने सुषमा को बिना किसी ठोस कारण के हटाने की बात पर खासी नाराजगी जताई और देवीलाल को दो टूक कहा गया कि सुषमा को कैबिनेट में वापस लिया जाए या फिर उन्हें सीएम पद गंवाना पड़ सकता है। केंद्रीय नेतृत्व केदबाव में देवीलाल को अपना फैसला पलटना पड़ा और सुषमा स्वराज को दोबारा अपनी कैबिनेट में मंत्री बनाना पड़ा।
सन 1977 और 1987 में उनके साथ विधायक व मुख्य संसदीय सचिव रहे रण सिंह मान बताते हैं मंत्री बनी सुषमा के कुछ सियासी विरोधी थे, जो उनके बढ़ते कदमों को रोकना चाहते थे। यही वजह थी कि उन्हे कैबिनेट से हटाया गया। उस वक्त देवीलाल सुषमा के विरोधियों के दबाव में थे। लेकिन सुषमा में क्षमता और उनका व्यक्तित्व ही ऐसा था कि उन्होंने अपने स्वर्णिम सियासी सफर की हर बाधा को कुशलता से दूर कर सियासत की बुलंदी को छुआ।
हर जिले में लगाया दरबार, शिक्षकों का दर्द सुना
1987 में सुषमा जब भाजपा-लोकदल सरकार में हरियाणा की शिक्षामंत्री बनी तो उन्होंने एक नया प्रयोग किया। उनके साथी विधायक डा. रघुबीर कादियान ने कहा कि उस वक्त सुषमा स्वराज ने एक नया प्रयोग कर हर जिले में दरबार लगाकार वहीं शिक्षकों की हर तरह की समस्याओं का समाधान किया। इससे पहले कई शिक्षक अपने मूल शिक्षण कार्य को छोड़कर अपनी समस्याओं के समाधान केलिए चंडीगढ़ के चक्कर लगाते रहते थे और इससे बच्चों की पढ़ाई का बहुत प्रभावित होती थी। डा. कादियान के अनुसार सदन में भी जब वे विषय पर तथ्यपरक बात रखती थी तो पक्ष-विपक्ष सभी उनकी बात बहुत ध्यान से सुनते थे।
वाक्या सन 2014 के लोकसभा चुनाव का है। मौजूदा राज्यमंत्री रतनलाल कटारिया अंबाला सीट से भाजपा के प्रत्याशी थी। सुषमा के केंद्रीय राजनीति में जाने के बाद अंबाला में यह रिवाज बना कि चुनावी मौसम में भाजपा का कोई प्रत्याशी मैदान में हो, तो एक रैली वह सुषमा स्वराज की जरूर करवाता था। इसी बहाने सुषमा को भी अपने शहर और शहरवासियों से रूबरू होने का मौका मिल जाता। लोकसभा चुनाव के मद्देनजर 2014 में रतनलाल कटारिया ने शहर के हूडा मैदान में सुषमा स्वराज की विशाल रैली का आयोजन किया।
मगर तभी खबर आई कि मौसम खराब होने की वजह से सुषमा अंबाला सिटी नहीं पहुंच पाएगी। उस वक्त अति व्यस्त शेड्यूल के बावजूद कटारिया को भाजपा की स्टार प्रचारक सुषमा स्वराज की यह रैली मिली थी और सुषमा ने भी उत्साह से अंबाला आने का वादा किया था। अब खराब मौसम ने सुषमा का दौरा टालने केपूरे हालात बना दिए थे। कटारिया भी पसोपेश में फंस गए, उधर भारी संख्या में शहरवासी भी अपनी ‘बेटी’ का इंतजार उत्साह से कर रहे थे। तभी रतनलाल कटारिया ने तुरंत सुषमा को मोबाइल मिलाया और उन्हे नम आंखों के साथ उन्हे अंबाला आने के वादे की याद दिलाई।
भावुकता के आगे सुषमा इतनी पसीज गई कि करीब चार घंटे बाद जब मौसम थोड़ा ठीक हुआ तो हैलीकाप्टर से दिल्ली से अंबाला पहुंची। जैसी ही सुषमा रैली के मंच पर पहुंची, तो उनके स्वागत में भावुक कटारिया हाथ जोड़कर रोने लगे। सुषमा ने न केवल उन्हे गले लगाया, बल्कि मंच से कहा ‘शहर की बेटी हूं, मेरा घर है जब मर्जी आ सकती हूं, इसलिए देरी केलिए माफी मांगने का तो सवाल ही नहीं है, मगर हां, भाई से आने का पक्का वादा किया था, इसलिए आना ही पड़ा।’