आम आदमी पार्टी की तरफ से पंजाब में आठ उम्मीदवारों की घोषणा कर दी गई है और प्रचार भी शुरू कर दिया है। वहीं, पंजाब में सबसे अधिक असमंजस शिअद-भाजपा नेताओं के लिए है। गठबंधन होगा या नहीं होगा, इसको लेकर दोनों पार्टियों के नेता एक स्थान पर खड़े हैं।
दोनों पार्टियों की तरफ से न तो एक दूसरे के खिलाफ बयानबाजी की जा रही है और न ही आपस में कोई संयुक्त मीटिंग की जा रही है। लिहाजा जमीनी स्तर पर वर्कर काफी असमंजस की स्थिति में है। प्रचार भी ठंडा पड़ा है।
कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों के आंदोलन के बाद अकाली दल ने 2020 में भाजपा के साथ अपना 24 साल पुराना गठबंधन तोड़ दिया था। इसके बाद जब पंजाब में विधानसभा चुनाव हुए तो अकाली दल और बीजेपी दो-दो सीटों पर सिमट गईं।
संगरूर और जालंधर लोकसभा उपचुनाव में भी दोनों पार्टियां कुछ खास नहीं कर पाईं। जहां अकाली दल पंजाब में अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है, वहीं दूसरी ओर बीजेपी पंजाब में मजबूत होने के लिए संघर्ष कर रही है।
दरअसल, दोनों पार्टियों में गठबंधन की वार्ता दिल्ली में चल रही है। इसमें सुनील जाखड़, कैप्टन अमरिंदर सिंह, संसदीय बोर्ड के सदस्य इकबाल सिंह ललपुरा, तरुण चुघ, विजय रूपाणी व अकाली दल की तरफ से सुखबीर बादल व हरसिमरत कौर बादल शामिल हैं, लेकिन इसकी जानकारी निचले स्तर पर नहीं दी जा रही है, जिससे भाजपा व अकाली दल के नेता मायूस हैं।
शहरों में भाजपा मजबूत, गांवों में शिअद
पंजाब बीजेपी की शहरी इलाकों में मजबूत स्थिति है, लेकिन गांवों में पार्टी कमजोर है। किसान आंदोलन के बाद बीजेपी की स्थिति गांवों में और कमजोर हो गई है और अब पार्टी खुद को मजबूत करने की कोशिश कर रही है। वहीं दूसरी ओर अकाली दल के पास एक मजबूत ग्रामीण वोट बैंक है।
ऐसे में दोनों पार्टियों का एक साथ आना उनके शहरी-ग्रामीण वोट बैंक समीकरण को फिट कर सकता है। भाजपा पंजाब में तीन सीटों पर लड़ती रही है, लेकिन इस बार भाजपा ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए तैयार है और इस बार भाजपा कम से कम छह सीट पंजाब में मांग रही है। लिहाजा, गठबंधन की अधिकारिक घोषणा नहीं हो पायी है। इसका असर जमीनी स्तर पर हो रहा है।