उन्होंने कहा कि कश्मीर के राजनैतिक नेतृत्व अपने निजी हितों के कारण बहुकोणी राजनीति खेलते रहे हैं, जिससे यह समस्या गहरी हुई है। उन्होंने कहा कि कश्मीर समस्या दिल्ली सरकार की नीतियों की असफलता को भी दर्शाता है, जिस कारण पाकिस्तान को यहां अपनी गंदी राजनीति करने का मौका मिला।
उन्होंने कहा कि कश्मीर के लोगों ने अपने आप को भारत सरकार के आंखों के तारे राजनीतिज्ञों के साथ अपनी निजी हितों की पूर्ति के लिए जुड़ने का मौका भी दिया। पाकिस्तान के अलावा चीन ने भी इस समस्या को उलझाने में बड़ा योगदान डाला है। उन्होंने कहा कि चीन ने पाकिस्तान के द्वारा कश्मीर समस्या में अपना दखल दिया, क्योंकि चीन यहां के ताजे पानी में अपने निजी हित देखता था, क्योंकि इसमें से सिलीकॉन चिप से लेकर सैटेलाइट का निर्माण करके दुनिया पर अपनी धाक जमाना चाहता है।
उन्होंने कहा कि कश्मीर के मसले पर जहां पाकिस्तान चीन की कठपुतली है वहां जेहादी आतंकवाद पाकिस्तान की कठपुतली है। उन्होंने कहा कि कश्मीर में पारसी, रूसी और चीनी सभ्यताओं का बहुत प्रभाव पाया जाता है, रणनीतिक तौर पर बड़ी अहमियत रखता है। कश्मीर में पहली बार पाकिस्तानी झंडा 31 अक्तूबर, 1947 को एक अंग्रेज फौजी अफसर के नेतृत्व अधीन लहराया गया था, जिसको बाद में पाकिस्तान ने इस काम के लिए देश का बड़ा सम्मान दिया। इस मौके पर सेवामुक्त ब्रिगेडियर प्रदीप शर्मा ने संचालक की भूमिका निभाई।