चंडीगढ़ एस्टेट ऑफिस किस तरह से लोगों को परेशान करता है, इसका उदाहरण सेक्टर-44 में रहने वाले मुकेश गोयल हैं। उन्हें एक बूथ के लिए करीब 28 साल संघर्ष करना पड़ा। बूथ का मामला एसडीएम कोर्ट से हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक गया। बूथ को बहाल करने के आदेश भी हुए लेकिन एस्टेट ऑफिस ने लटकाए रखा। अंत में सेवा का अधिकार आयोग ने मामले में संज्ञान लिया और ब्रांच हेड पर जुर्माना लगाने के साथ कार्रवाई के आदेश दिए हैं।
मुकेश गोयल ने बताया कि वित्त सचिव के पास अपील में जाने के बाद भी वो बूथ के लिए पांच साल एसडीएम-कम-एस्टेट ऑफिसर साउथ के पास चक्कर काटते रहे। दिसंबर 2020 में एसडीएम-कम-एस्टेट ऑफिसर ने ब्रांच इंचार्ज को आदेश दिए कि उनकी लापरवाही की वजह से ये देरी हुई है, इसलिए 15 दिन के अंदर बकाया राशि बताएं और मुकेश गोयल को कहा गया कि वो दो महीने के अंदर इस राशि को जमा करें। इस आदेश के बाद भी मुकेश गोयल ने कई बार एस्टेट ऑफिस को पत्र लिखा, वो दफ्तर भी गए लेकिन उन्हें राशि नहीं बताई गई। गोयल ने बताया कि तंग आकर मार्च 2022 में उन्होंने सेवा का अधिकार आयोग का दरवाजा खटखटाया। दो सुनवाई हुई। सुनवाई में आयोग के चेयरमैन केके जिंदल ने एस्टेट ऑफिस से अधिकारी से देरी का कारण पूछा तो उन्होंने कहा कि वो वरिष्ठ अधिकारियों से मंजूरी का इंतजार कर रहे थे। इस पर आयोग ने जमकर फटकार लगाई और कहा कि जब पहले ही एस्टेट ऑफिसर बकाया राशि बताने के आदेश दे चुके हैं, तो फिर वो किस आदेश का इंतजार कर रहे थे।
आयोग ने एस्टेट ऑफिस के ब्रांच इंजार्च पर 10 हजार रुपये का जुर्माना लगाया है। कहा गया है कि इसमें से 9 हजार रुपये मुकेश गोयल को मुआवजा के तौर पर दिया जाएगा। एस्टेट ऑफिसर को आदेश दिए हैं कि बकाया राशि को बताने में देरी करने पर संबंधित कर्मचारी के खिलाफ जांच के आदेश दें या फिर सख्त कार्रवाई करें।
सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले में चंडीगढ़ एस्टेट ऑफिस को जमकर फटकार लगाई थी। जस्टिस हेमंत गुप्ता और जस्टिस एएस बोपन्ना की बेंच ने अपने आदेश में यहां तक लिखा कि एस्टेट ऑफिस की कार्यप्रणाली ये है कि, तुम मुझे चेहरा दिखाओ, मैं नियम दिखाऊंगा। सुप्रीम कोर्ट ने एस्टेट ऑफिस को अंडरबेली तक कह दिया था। आदेश में लिखा कि, अधिकारी ऐसे निर्णय लेने में असमर्थ हैं जो नागरिक हितैषी हैं। यहां तक कि एस्टेट ऑफिस के कामकाज में आ रही बाधाओं को दूर करने का भी प्रयास नहीं किया जाता है।