पर्यावरण के लिए भी सुरक्षित है आरपीडी डिवाइस
पर्यावरण के लिए सुरक्षित आरपीडी डिवाइस बायोडिग्रेडेबल सेल्यूलोज पर आधारित है, जबकि एलएलई में क्लोरोफॉर्म, डाइक्लोरोमीथेन, डाइएथर जैसे जहरीले कार्बनिक सॉल्वेंट उपयोग होते हैं। प्रोसेसिंग क्षमता की बात करें तो आरपीडी डिवाइस में 10 सैंपल यानी 2 केस को मात्र 40 मिनट में प्रोसेस किया जा सकता है, जबकि एलएलई तकनीक में एक सैंपल को तैयार करने में 1 से 4 दिन तक लग सकते हैं। एलएलई की प्रति सैंपल लागत 500 से 1000 रुपये तक आती है, जो सॉल्वेंट व कांच के टेस्ट ट्यूब्स आदि के कारण काफी महंगी साबित होती है। वहीं, आरपीडी डिवाइस की प्रति सैंपल लागत मात्र 25 रुपये से भी कम है।
कैसे काम करता है आरपीडी डिवाइस
इस डिवाइस में सेलुलोज पेपर को 1-ऑक्टानोल के साथ सैंडविच की तरह बनाया गया है, जिसमें बीच में एक चुंबकीय छड़ रखी गई है। इसे जैविक नमूनों में डुबोकर 400 आरपीएम की गति से 30 मिनट तक घुमाया जाता है। इससे पेपर पर विश्लेषण के लिए जरूरी रसायन चिपक जाते हैं। इसके बाद पेपर से उन रसायनों को मेथनॉल में निकालकर जीसी-एमएस तकनीक से जांच की जाती है।
राजौरी रहस्यमयी मौतों का मामला भी आरपीडी डिवाइस ने सुलझाया
राजौरी जिले के बदहाल गांव में दिसंबर 2024 से जनवरी 2025 के बीच हुई 17 लोगों की रहस्यमयी मौतों के पीछे की वजह का खुलासा भी सीएफएसएल चंडीगढ़ ने आरपीडी डिवाइस से किया था। सीएफएसएल चंडीगढ़ की टीम ने घटनास्थल से 650 से अधिक नमूने इकट्ठा किए और 51 केसों की जांच की।
टॉक्सीकोलॉजी जांच में पाया गया कि सभी मृतकों के शवों, खानों, बर्तनों और कपड़ों में एक जहरीला कीटनाशक क्लोर्फेनापाइर मिला। विशेष जांच में आटे, मक्का की रोटी और बर्तन में क्लोर्फेनापाइर की मौजूदगी पाई गई। यह एक खतरनाक कीटनाशक है, जिसकी वजह से लक्षण देरी से प्रकट होते हैं और इलाज में देरी जानलेवा साबित हो सकती है। यह भारत में रिपोर्ट हुआ क्लोर्फेनापाइर जहर का पहला बड़ा मामला है।