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बेअदबी कांड पर रिटायर्ड जस्टिस जोरा सिंह बोले, 6 मुख्य संदिग्धों से पूछताछ ही नहीं हुई

Thu, 10 Jan 2019 09:33 AM IST
खुशबू गोयल न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
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रिटायर्ड जस्टिस जोरा सिंह ने आरोप लगाया है कि बरगाड़ी कांड में पुलिस ने प्रमुख संदिग्धों से पूछताछ ही नहीं की। ऊपर से आए निर्देश के बाद पुलिस ने जांच के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति की। अगर संदिग्धों को उसी समय जांच में शामिल कर लिया जाता तो सच तुरंत सामने आ जाता। शिअद-भाजपा सरकार ने बरगाड़ी कांड की जांच को जस्टिस जोरा सिंह आयोग गठित किया था। हाल में जस्टिस जोरा सिंह ने आम आदमी पार्टी ज्वॉइन की है। 

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मीडिया से बातचीत में उन्होंने कहा कि 12 अक्तूबर 2015 को बरगाड़ी में श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी के अंग मिले। कोटकपूरा में धरना लगा और बीस लोगों की एसआईटी बना दी। सबसे पहले पुलिस को गुरुद्वारा बुर्ज हरि सिंह के ग्रंथी पर शक था। जो किसी को बताए बगैर गुरुद्वारा छोड़कर चला गया और श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी की बीड़ चोरी हो गई। लेकिन उससे पूछताछ तक नहीं की गई। 

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उन्होंने कहा कि सिख संगठनों ने ग्रंथी समेत छह संदिग्धों के बारे में आयोग और उससे पहले पुलिस को जानकारी दी थी। लेकिन पुलिस ने इनमें से किसी से भी पूछताछ नहीं की। जो यह साबित करता है कि इसके पीछे किसी अथॉरिटी का हाथ था। जस्टिस जोरा सिंह ने कहा कि अपनी रिपोर्ट में उन्होंने प्रकाश सिंह बादल व सुखबीर बादल का जिक्र नहीं किया। लेकिन इशारा उनकी तरफ ही था। क्योंकि बेअदबी के समय अकाली दल सत्ता में था और गृह विभाग सुखबीर के पास था।

 उन्होंने कहा कि जिस तरह बादल ने रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की, उसी तरह कैप्टन सरकार ने भी अब तक कुछ नहीं किया। कैप्टन बताएं कि वह किसको बचा रहे हैं। इस मौके पर विधायक अमन अरोड़ा, कुलतार संधवां, कुलदीप धालीवाल, नील गर्ग भी मौजूद थे।

संदिग्धों के स्केच नहीं बने
जस्टिस जोरा सिंह ने कहा कि पुलिस ने लापरवाही की सारी हदें पार कर दीं, संदिग्धों के स्केच तक नहीं बनवाए। फिर जिन लोगों ने दो संदिग्ध युवकों को देखा था, उनके बजाय किसी और के बताए ब्यौरे पर स्केच तैयार करवाए। उसके बाद वे स्केच प्रिंट या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में जारी तक नहीं किए गए।

अफसरों ने नहीं की पड़ताल
जस्टिस जोरा सिंह ने बताया कि आयोग की जांच में सामने आया कि एसआईटी पूरी तरह काम ही नहीं कर रही थी। उनके सामने एसपी अमरजीत सिंह और डीएसपी गुरजीत रोमाणा ने स्वीकार किया कि उन्होंने कभी भी बेअदबी मामले की पड़ताल नहीं की। एसआईटी का गठन भी सिर्फ खानापूर्ति था।
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