उन्होंने कहा कि सिख संगठनों ने ग्रंथी समेत छह संदिग्धों के बारे में आयोग और उससे पहले पुलिस को जानकारी दी थी। लेकिन पुलिस ने इनमें से किसी से भी पूछताछ नहीं की। जो यह साबित करता है कि इसके पीछे किसी अथॉरिटी का हाथ था। जस्टिस जोरा सिंह ने कहा कि अपनी रिपोर्ट में उन्होंने प्रकाश सिंह बादल व सुखबीर बादल का जिक्र नहीं किया। लेकिन इशारा उनकी तरफ ही था। क्योंकि बेअदबी के समय अकाली दल सत्ता में था और गृह विभाग सुखबीर के पास था।
उन्होंने कहा कि जिस तरह बादल ने रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की, उसी तरह कैप्टन सरकार ने भी अब तक कुछ नहीं किया। कैप्टन बताएं कि वह किसको बचा रहे हैं। इस मौके पर विधायक अमन अरोड़ा, कुलतार संधवां, कुलदीप धालीवाल, नील गर्ग भी मौजूद थे।
संदिग्धों के स्केच नहीं बने
जस्टिस जोरा सिंह ने कहा कि पुलिस ने लापरवाही की सारी हदें पार कर दीं, संदिग्धों के स्केच तक नहीं बनवाए। फिर जिन लोगों ने दो संदिग्ध युवकों को देखा था, उनके बजाय किसी और के बताए ब्यौरे पर स्केच तैयार करवाए। उसके बाद वे स्केच प्रिंट या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में जारी तक नहीं किए गए।
अफसरों ने नहीं की पड़ताल
जस्टिस जोरा सिंह ने बताया कि आयोग की जांच में सामने आया कि एसआईटी पूरी तरह काम ही नहीं कर रही थी। उनके सामने एसपी अमरजीत सिंह और डीएसपी गुरजीत रोमाणा ने स्वीकार किया कि उन्होंने कभी भी बेअदबी मामले की पड़ताल नहीं की। एसआईटी का गठन भी सिर्फ खानापूर्ति था।