चंडीगढ़। किन्नरों का समाज की ओर से शोषण किए जाने से पहले इसकी शुरुआत उनके घरों में होती है। डीएवी कॉलेज-10 के समाजशास्त्र विभाग के अस्सिटेंट प्रोफेसर सोनू ने ट्राइसिटी (मोहाली और चंडीगढ़) के 20 किन्नरों पर शोध सर्वे किया। इस दौरान उन्होंने पाया कि सबसे बड़ी समस्या किन्नर वर्ग के लिए ये है कि उन्हें समाज के बजाय घर से अधिक प्रताड़ना मिलती है। परिवार का सहयोग नहीं होने के कारण उन्हें दूसरे राज्य में परिवार से पहचान बदल कर रहना पड़ता है।
डॉ. सोनू ने बताया कि अधिकांश किन्नरों को छोटी उम्र में ही घर से बाहर निकाल दिया जाता है। पांचवीं-सातवीं तक पढ़े होने के कारण नौकरी नहीं मिलती है और कोई दैनिक मजदूरी पर भी नहीं रखता। इस कारण बहुत से किन्नर सेक्स वर्क से अपनी रोजी-रोटी कमाते हैं या लाइटों और रेलगाड़ी में बधाई मांगकर गुजारा करना पड़ता है। इस कारण उन्हें गंभीर बीमारियां हो जाती हैं। सर्वे में शामिल मोहाली निवासी दो किन्नरों की एचआईवी से मौत हो गई थी। इसमें एक की उम्र 33 वर्ष और एक की उम्र 52 वर्ष थी।
चार साल के बच्चे को डेरे में छोड़ा
डॉ. सोनू ने बताया कि सर्वे में एक चार साल के बच्चे को भी शामिल किया। उसे उसके परिवार ने चंडीगढ़ के किन्नर डेरे में छोड़ दिया था। हालांकि बच्चे को अभी लिंग की इतनी समझ भी नहीं थी। चंडीगढ़ और मोहाली के डेरों में पंजाब, हरियाणा, उत्तराखंड, केरल, तमिलनाडु, दिल्ली इत्यादि जगहों के किन्नर रह रहे हैं। किन्नरों ने बताया कि परिवार समाज में बदनामी के डर से उन्हें घर से बाहर निकाल देते हैं। इस कारण उन्हें परिवार से दूर दूसरे राज्य में जाकर बसना पड़ता है।
स्कूलों को चलाना चाहिए शिक्षा अभियान
डॉ. सोनू ने बताया कि किन्नरों को समाज के सामान्य वर्ग में स्थान दिलाने का एक ही रास्ता शिक्षा है। स्कूलों को डेरों में शिक्षा अभियान चलाना चाहिए और स्कूलों और कॉलेजों में भी लिंग समानता को लेकर जागरूक करना चाहिए। किन्नरों को अस्पताल में इलाज करवाने और पुलिस में रिपोर्ट लिखवाने में भी मानसिक प्रताड़ना से गुजरना पड़ता है। स्कूलों और कॉलेजों की तरफ से जागरुकता अभियान में सभी वर्गों को शामिल किया जाना चाहिए। पीयू में उच्च शिक्षा में पिछले सालों में किन्नरों की कुछ भागीदारी देखने को मिली है। यह सकारात्मक कदम है।