ज्ञानपीठ तथा पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित पंजाबी साहित्यकार प्रोफेसर गुरदयाल सिंह
- फोटो : amar ujala
ज्ञानपीठ तथा पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित पंजाबी साहित्यकार प्रोफेसर गुरदयाल सिंह (83) का मंगलवार दोपहर बठिंडा के एक निजी अस्पताल में निधन हो गया।
इसकी सूचना मिलते ही साहित्य प्रेमियों में शोक की लहर दौड़ गई। गुरदयाल सिंह पिछले कुछ समय से बीमार थे और बठिंडा के एक निजी अस्पताल में उनका उपचार चल रहा था। उनका अंतिम संस्कार 18 अगस्त को सुबह 10 बजे जैतो में किया जाएगा। प्रोफेसर गुरदयाल सिंह साहित्य के साथ-साथ पंजाब और पंजाबियत से संबंधित मामलों पर अच्छी पकड़ रखते थे। अमर उजाला के संपादकीय पेज पर कई बार उनके विशेष लेख प्रकाशित हुए हैं।
---------------
1999 में मिला था ज्ञानपीठ पुरस्कार
साहित्य सफर के दौरान उन्हें ज्ञानपीठ, पद्मश्री, सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार, साहित्य अकादमी पुरस्कार, चार बार बेस्ट फिक्शन बुक अवॉर्ड, पंजाब साहित्य अकादमी पुरस्कार, शिरोमणि साहित्यकार समेत साहित्य जगत के लगभग सभी पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। 1998 में उन्हें पद्मश्री से नवाजा गया जबकि 1999 में उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया। साल 2015 में उनका नाम लिम्का बुक्स ऑफ रिकॉर्ड में दर्ज किया गया। कुछ समय पहले ही भारतीय साहित्य अकादमी नई दिल्ली ने उन्हें लाइफ फेलोशिप देने की घोषणा की थी।
चित्रकारी से शुरू किया था साहित्य सफर
gurdyal singh books
- फोटो : amar ujala
10 जनवरी, 1933 को पैदा हुए प्रो. गुरदयाल सिंह का जीवन काफी संघर्ष में बीता। घरेलू कारणों की वजह से पहले स्कूल छोड़कर काम करने लगे और बाद में 10वीं पास करके निजी स्कूल में अध्यापन करने लगे। उच्च शिक्षा लेकर लेक्चरर बने और 15 साल बाद पंजाबी यूनिवर्सिटी पटियाला में पहले रीडर बने और फिर प्रोफेसर के पद से सेवामुक्त हुए। वे बचपन से ही कला और साहित्य में विशेष रुचि रखते थे और इसका आगाज उन्होंने चित्रकारी और गायकी से किया था। जैतो के गुरुद्वारा गंगसर में वे कीर्तन भी करते रहे। जब संतोष नहीं मिला तो उन्होंने लेखन कला की ओर रुख कर लिया और फिर कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा।
1957 में लिखी थी पहली कहानी
साल 1957 में उन्होंने पहली कहानी भागां वाले लिखी जोकि प्रो. मोहन सिंह की पत्रिका पंज दरिया में प्रकाशित हुई। 1962 में उनका पहला कहानी संग्रह सग्घी फुल्ल प्रकाशित हुआ। साल 1964 में लिखे पहले ही उपन्यास मड़ी दा दीवा ने उन्हें विश्व स्तर के लेखकों में लाकर खड़ा कर दिया और प्रसिद्ध आलोचक डॉ. नामवर सिंह, डॉ. अतर सिंह, डॉ. अमरीक सिंह, डॉ. जोगिंदर सिंह आदि ने इसे ट्रेंड सेटर करार दिया।
मड़ी दा दीवा की हिंदी व अंग्रेजी के अतिरिक्त रूसी भाषा में पांच लाख प्रतियों की बिक्री हुई जो अपने आप में एक रिकॉर्ड था। इसके पश्चात जहां समय के साथ-साथ उनके उपन्यास अद्ध चानणी रात, अणहोए, कुवेला, अन्ने घोड़े दा दान, पोह फुटाले तों पहलां, परसा, रेते दी एक मुट्ठी, आहण आदि प्रकाशित हुए वहीं अनेकों कथा संग्रह प्रकाशित हुए। उनके उपन्यास अन्ने घोड़े दा दान पर आधारित पहली पंजाबी फिल्म है जिसे इटली के अंतरराष्ट्रीय फिल्म मेले में दिखाया गया। इसके अतिरिक्त यह फिल्म पांच अन्य देशों में प्रदर्शित की जा चुकी है।