कारगिल की चोटियों पर लड़ रहे जवानों तक रसद और गोला-बारूद भी बड़ी मुश्किल से तक पहुंचता था। जिन मुख्य रास्तों से सेना की गाड़ियां आगे बढ़ती थी। उन रास्तों पर दुश्मन लगातार आर्टलरी फायर कर हमारी गाड़ियों और रास्तों को नुकसान पहुंचाने में जुटा रहा था। इसलिए रसद, गोला बारूद और जवानों को उनके फायर बेस कैंप तक पहुंचाने के लिए इन वादियों में बहुत ही ज्यादा मुश्किल रास्तों का चयन करना पड़ता था।
इस काम में यहां के स्थानीय लोगों ने सेना की बहुत मदद की। यही लोग सेना की बटालियन को बताते थे कि ऊपर चोटियों तक पहुंचने के लिए किन नए रास्तों का इस्तेमाल किया जा सकता है। रास्ते लंबे और जोखिम भरे जरूर होते थे। जवानों की टोलियां, रसद और गोला बारूद सुरक्षित अपने फायरिंग बेस कैंप तक पहुंच जाते थे।
ठंड, बर्फीले तूफान से काला पड़ रहा था शरीर, उखड़ने लगी थी चमड़ी
युद्ध के दौरान जवान जब फील्ड में पहुंचे थे। तो उन्हें वहां के मौसम का भी बिल्कुल अनुमान नहीं था। लिहाजा अपने साथ सिर्फ स्लीपिंग बैग और 3 दिन का राशन लेकर दुश्मन से लड़ने ऊपर चले थे। मगर जैसे-जैसे ऊपर चोटियों की ओर बढ़ते गए कम ऑक्सीजन, बर्फीली और शुष्क हवाओं के थपेड़ों में हमारे जवानों को सताना शुरू कर दिया।
पूरे युद्ध के दौरान कई बार वहां बर्फ भी गिरी। ठंड से ठिठुरते हुए जवान दिन भर वहीं बड़े-बड़े पत्थरों की आड़ में बैठे रहते और रात होने के बाद हमला बोलते। मौसम की दुश्वारियां ने जवानों का हौसला तो पस्त नहीं किया। मगर जवानों की चेहरे और हाथों की चमड़ी काली पड़ उखड़ने लगी। उसके बावजूद जवानों ने युद्ध लड़ते हुए फतह हासिल की। बाद में जवानों को चेहरा ढकने के लिए पटके, ग्लव्स और वैसलीन दी गई।
युद्ध भूमि में एक बार फायर बेस कैंप से निकलने के बाद कितना ऊपर जवानों को जाना है। यह भी मालूम नहीं होता था। जहां-जहां चलते हुए वे रुकते थे, वहां किसी प्रकार के टेंट की व्यवस्था भी नहीं थी। खुले आसमान में विपरीत मौसम का सामना करते हुए जवानों को आगे बढ़ना था और अपना लक्ष्य जीत हासिल करना था।