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यहां बगावत बनी प्रमुख पार्टियों के लिए खतरा

Sat, 12 Apr 2014 04:40 PM IST
अखिल तलवार/अमर उजाला, चंडीगढ़
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गुरदासपुर में कांग्रेसी साथ-साथ नहीं  
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गुरदासपुर में प्रदेश कांग्रेस प्रधान प्रताप सिंह बाजवा को सबसे ज्यादा नाराजगी झेलनी पड़ रही है। अश्वनी सेखड़ी, रमन बहल, सुखजिंदर रंधावा, तृप्त रजिंदर बाजवा नाराज चल रहे हैं। ज्यादातर नेता नामांकन में जरूर पहुंचे, पर अंदरखाते नुकसान पहुंचा सकते हैं। अशोक शर्मा को पार्टी में दोबारा लाने से पठानकोट के रमन भल्ला और नरेश पुरी को शामिल करने से सुजानपुर के महाजन खफा हैं। खडूर साहिब में हरमिंदर गिल के सामने कई मुश्किलें हैं। पिछली बार के उम्मीदवार राणा गुरजीत गायब हैं, वह कैप्टन अमरिंदर सिंह के चुनाव इंचार्ज हैं। यहां से टिकट के दावेदार और प्रताप बाजवा के राइट-हैंड प्रो. गुरविंदर सिंह मम्मनके भी गुस्से में हलका छोड़ कर गुरदासपुर पहुंच गए हैं। तरनतारन के पूर्व जिला प्रधान अग्निहोत्री भी नाराज चल रहे हैं।

जालंधर के कई नेताओं ने दूसरी जगह डेरा डाला
जालंधर के उम्मीदवार चौधरी संतोख को अपने हलके फिल्लौर में गुरविंदर अटवाल से खतरा है। शाहकोट हलके के चारों बड़े नेता गायब हैं। चुनाव लड़े सीडी कंबोज इस बार अंबिका सोनी के चुनाव इंचार्ज हैं। लाडी शेरोवालिया, राणा गुरजीत के करीबी हैं, सो अमृतसर में हैं। बृज भूपिंदर सिंह लाली बीमार हैं, तो राजनबीर सिंह ज्यादातर चंडीगढ़ में रहते हैं। साउथ हलके के प्रतिनिधि मोहिंदर सिंह केपी अपनी सारी टीम के साथ होशियारपुर में चुनाव लड़ रहे हैं। नॉर्थ के अवतार हेनरी कभी जालंधर होते हैं तो कभी होशियारपुर में केपी की मदद करते हैं। कैंट में जगबीर बराड़ से बाकी कांग्रेसियों की नाराजगी पार्टी के लिए मुश्किल बनी है।
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होशियारपुर और लुधियाना में भी बगावत

होशियारपुर में केपी से संतोष ग्रुप ने किया किनारा
होशियारपुर में मोहिंदर सिंह केपी को पूर्व सांसद संतोष चौधरी व उनके ग्रुप का समर्थन अब तक नहीं मिला है। शहर के विधायक सुंदर शाम अरोड़ा का ज्यादातर समय भी आनंदपुर साहिब हलके में गुजरता है।

बिट्टू को खुलकर नहीं मिल रहा साथ
लुधियाना में रवनीत बिट्टू के लिए सबसे बड़ी चुनौती पूर्व सांसद मनीष तिवारी का गुट बना हुआ है। इस गुट के प्रमुख नेता व जिला प्रधान पवन दीवान जरूर रस्म-अदायगी के लिए आ जाते हैं। पर बाकी लोग अभी तक खुल कर बिट्टू के साथ नहीं चले हैं। हालांकि हलके के बाकी नेता बिट्टू के साथ हैं।

फतेहगढ़ साहिब और पटियाला में जुझ रहे बगावत से

दूलो ने बनाई साधू से दूरी
फतेहगढ़ साहिब में साधू सिंह धरमसोत के लिए सबसे बड़ी मुसीबत पूर्व प्रदेश प्रधान शमशेर सिंह दूलो बन गए हैं। पूर्व सांसद सुखदेव सिंह लिबड़ा अकाली दल में चले गए और दूलो साथ नहीं दे रहे हैं। धरमसोत खुद बाजीगर बिरादरी से हैं, जिसके वोट अमलोह में हैं। पर पूरे हलके में रविदास बिरादरी का वर्चस्व है, जिसका प्रतिनिधित्व दूलो करते हैं। ऐसे में दूलो का साथ न चलना पार्टी के लिए नुकसानदायक हो सकता है।

परनीत की राह में कई कांटे
पटियाला के रण में महारानी परनीत कौर की राह में कई कांटे बिछे हुए हैं। इस हलके के दो विधायक कैप्टन अमरिंदर सिंह और साधू सिंह धरमसोत खुद चुनाव मैदान में हैं। दो अन्य विधायक ब्रह्म मोहिंद्र और राणदीप नाभा के साथ कैप्टन परिवार का 36 का आंकड़ा होने के कारण वे प्रचार से गायब हैं। लाल सिंह साथ चल रहे हैं, पर क्या गुल खिलाएंगे, किसी को नहीं पता।

संगरूर और बठिंडा में बगावती तेवर

संगरूर में विधायकों ने बनाई सिंगला से दूरी
संगरूर में विजय इंदर सिंगला को सबसे बड़ी चुनौती कांग्रेसियों से ही मिल रही है। कांग्रेस के चार मौजूदा विधायक पूरी तरह चुनाव से गायब हैं। केवल ढिल्लों का ज्यादातर समय आनंद पुर साहिब हलके में बीत रहा है। तो मोहम्मद सदीक ने अमृतसर में डेरा डाल रखा है। अरविंद खन्ना लंदन गए हुए थे। तो हरचंद कौर प्रचार नहीं कर रही हैं। पुरानी नाराजगी के चलते कैप्टन समर्थक चारों विधायकों का गुट इस बार सिंगला को मजा चखाने के मूड में है। रजिंदर कौर भट्ठल प्रचार कर रही हैं, पर वह आए दिन दूसरे हलकों में भी जाती रहती हैं।

मनप्रीत को नहीं मिल रहा हाथ का साथ
बठिंडा में कांग्रेस के बल पर जीतने आए पीपीपी सुप्रीमो मनप्रीत बादल को अब तक हाथ का साथ नहीं मिला है। मानसा में शेर सिंह गागोवाल समेत अन्य कांग्रेसी तो उनके साथ चल पड़े हैं। पर बठिंडा में कोई साथ नहीं आया है। सुरिंदर सिंगला एक भी दिन बठिंडा आए ही नहीं। हरमिंदर जस्सी कभी-कभार दिख जाते हैं। पर न तो डोर-टु-डोर पर जाते हैं, न ही उन्होंने मनप्रीत के हक में कोई सभा की। सिर्फ जिला प्रधान मोहनलाल झुंबा साथ चल रहे हैं।

फरीदकोट और फिरोजपुर भी बगावत से अछूते नहीं

डैनी ने बढ़ाईं जोगिंदर की मुश्किलें
फरीदकोट से जोगिंदर सिंह पंजगराईं के लिए पिछली बार के उम्मीदवार सुखविंदर सिंह डैनी ने मुश्किल खड़ी कर दी है। आखिरी दिन डैनी ने चुपचाप आजाद उम्मीदवार के रूप में नामांकन करके पार्टी की किरकिरी कर दी है। हाईकमान के दबाव के बाद वह नामांकन वापस ले भी लें, पर गुटबाजी तो सामने आ गई है।

जाखड़ को टिकट मिलने से सोढ़ी नाराज
फिरोजपुर में पार्टी दिग्गज सुनील जाखड़ को ऊपरी तौर पर कोई विरोध नहीं झेलना पड़ रहा। पर टिकट न दिए जाने से राणा गुरमीत सोढी की नाराजगी किसी से छिपी नहीं है। वहीं, विधायक परमिंदरजीत सिंह पिंकी भी खास खुश नहीं हैं। वह ज्यादातर समय अंबिका सोनी के हलके में बिता
रहे हैं।

भाजपा में भी संगठित नहीं हो पाए नेता

अमृतसर में सिद्धू गुट ने साधी चुप्पी
अमृतसर से पार्टी ने अपने हैवीवेट लीडर अरुण जेटली को उतार दिया। पर जेटली की चुनावी मुहिम अब तक ट्रैक पर नहीं आ सकी है। पूर्व सांसद नवजोत सिद्धू ने अपने सियासी गुरु जेटली के हक में अमृतसर में प्रचार करने से साफ इंकार कर दिया है। उनकी पत्नी डॉ. नवजोत कौर भी रस्म-अदायगी ही कर रही हैं।

वहीं, सिद्धू गुट के बाकी नेता तो सिद्धू के इशारे के बाद घर बैठ गए हैं। बचे भाजपा नेता अनिल जोशी, रजिंदर मोहन छीना, तरुण चुघ, लक्ष्मीकांता चावला आदि जो प्रचार में जुटे हैं, वे भी अपनी-अपनी ढफली बजा रहे हैं। सुभाष शर्मा अपने तौर पर कॉर्डिनेट कर रहे हैं। पर जेटली जैसे नेता के लड़ने के बावजूद भाजपा अब तक संगठित नजर नहीं आ रही है।
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हो‌शियारपुर और गुरदासपुर में बगावत चरम पर

सांपला से स्थानीय नेताओं ने बनाई दूरी  
होशियारपुर में विजय सांपला पहुंचते ही कोठी कब्जाने के विवाद में घिर गए हैं। यहां पर सांपला की कई प्रमुख नेताओं तीक्ष्ण सूद, सोम प्रकाश, जगतार सैनी और जिला प्रधान शिव सूद से बन नहीं रही है। सांपला ज्यादा भरोसा अविनाश राय खन्ना पर कर रहे हैं। खन्ना जेएंडके के प्रभारी होने के बावजूद राज्य छोड़ कर होशियारपुर में डटे हैं। खन्ना का तीक्ष्ण सूद के साथ 36 का आंकड़ा जगजाहिर है। इस चक्कर में दूसरा गुट अलग-थलग है। जब कोई बड़ा नेता आता है तो इकट्ठे हो जाते हैं, वैसे नहीं। प्रदेश प्रधान कमल शर्मा एक बार समझौता भी करा चुके हैं, पर बात नहीं बनी। सांपला स्थानीय नेताओं को दरकिनार कर जालंधर से अपनी टीम ले आए हैं, इससे भी नाराजगी है।

सलारिया पर टिकी निगाहें
गुरदासपुर में विनोद खन्ना को ऊपरी तौर पर स्वर्ण सलारिया के नामांकन वापस लेने से राहत जरूर मिली है। पर अंदरखाते सलारिया नुकसान कर सकते हैं। क्योंकि खन्ना फिर जीत गए तो अगले चुनाव में फिर सलारिया के लिए चुनौती बनेंगे। सलारिया ने खुले तौर पर यह कह भी दिया है कि वह किसी उम्मीदवार के लिए नहीं, बल्कि पार्टी के लिए प्रचार करेंगे।
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