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जानिए, पंजाब कांग्रेस में विवाद की 4 असली जड़ें

Sun, 11 Jan 2015 01:10 PM IST
अनिल भारद्वाज/अमर उजाला, चंडीगढ़
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पंजाब कांग्रेस में विवाद का दौर बढ़ता ही चला रहा है। पार्टी के दोनों गुट खुलकर आमने-सामने आ गए हैं। पंजाब कांग्रेस में लगातार बढ़ रहे संकट के पीछे बीते सात साल की पराजयों का लंबा सिलसिला है।
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अब हालात इस कदर नाजुक हो गए हैं कि पार्टी के दो दिग्गज, कैप्टन अमरिंदर सिंह और प्रताप सिंह बाजवा शुक्रवार को खुलकर आमने-सामने आ गए हैं।

एक अन्य दिग्गज जगमीत सिंह बराड़ ने पार्टी को कुछ दिन पहले ही अलविदा कहा है, जबकि पूर्व मुख्यमंत्री राजिंदर कौर भट्ठल फिलहाल चुप्पी साधे हुए हैं।

इन हालात में कांग्रेस हाईकमान के लिए भी चिंता की घड़ी है। मौजूदा हालात में पंजाब कांग्रेस का संकट कैसे हल हो, इसी उधेड़बुन में उलझा है पार्टी का राष्ट्रीय नेतृत्व।

नहीं थम रही पंजाब कांग्रेस में गुटबाजी

पंजाब में कांग्रेस की पिछली सरकार वर्ष 2002 में कैप्टन अमरिंदर सिंह के नेतृत्व में बनी थी। उसके बाद 2007 में हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस हार गई।

इसके साथ ही शुरू हुआ प्रदेश कांग्रेस में उलटफेर और गुटबाजी का जबरदस्त खेल। कैप्टन अमरिदंर सिंह, राजिंदर कौर कौर भट्ठल, शमशेर सिंह दूल्लो, प्रताप सिंह बाजवा, महिंद्र सिंह केपी आदि के ग्रुप सक्रिय हो गए।

2009 में लोकसभा चुनाव के वक्त महिंदर सिंह केपी पीपीसीसी अध्यक्ष थे, लेकिन उन्हें जालंधर से टिकट मिल गया और कैप्टन ग्रुप के लाल सिंह को पीपीसीसी का कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया। कैप्टन खुद कंपेन कमेटी प्रमुख की जिम्मेदारी केंद्रीय नेतृत्व से ले आए।

2009 के बाद शुरू हुआ बिखराव

इसमें कोई दो राय नहीं कि कांग्रेस का प्रदर्शन 2009 के आम चुनाव में काफी अच्छा रहा और पार्टी पंजाब की 13 में से 8 लोकसभा सीटें जीतने में सफल रही। यूपीए-2 के गठन में इसकी अहम भूमिका रही, लेकिन इसके बाद प्रदेश कांग्रेस में बिखराव का सिलसिला शुरू हो गया।

गुटबंदी इस कदर हावी हुई कि 2012 के विधानसभा चुनाव में प्रदेश की अकाली-भाजपा गठबंधन सरकार के खिलाफ लोगों में रोष व्याप्त होने के बावजूद कांग्रेस यह चुनाव जीत नहीं पाई। कई सीटें गुटबाजी की भेंट चढ़ीं। उस वक्त कैप्टन अमरिंदर पीपीसीसी अध्यक्ष थे।
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कैप्टन द्वारा बाजवा का विरोध

इसके बाद प्रदेश कांग्रेस की कमान आई मौजूदा अध्यक्ष प्रताप सिंह बाजवा के हाथ। कैप्टन ने बाजवा की नियुक्ति के वक्त से ही उनके खिलाफ मोर्चा खोल दिया।

2014 के लोकसभा चुनाव में पंजाब में कांग्रेस की निराशाजनक कारगुजारी और खुद बाजवा के बड़े अंतर से चुनाव हार जाने की घटना ने गुटबाजी को और हवा दे दी। उनके खिलाफ प्रदेश कांग्रेस के कई बड़े नेता खुलकर सामने आ गए। शुक्रवार को कैप्टन और बाजवा की परस्पर विरोधी बयानबाजी ने गुटबाजी को चरम पर ला दिया है।

भाजपा को लाभ की उम्मीद
सियासी माहिर कांग्रेस की इस गुटबाजी का फायदा निश्चित रूप से भाजपा को होने की बात कर रहे हैं। उनकी नजर में गुटबाजी के चलते शहरी क्षेत्रों में कांग्रेस का खिसकता जनाधार सीधे भाजपा को लाभ दे रहा है। कांग्रेसी कार्यकर्ता भाजपा की तरफ रुख कर रहे हैं।
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