गुल्लक में जाता है हर मुनाफे का हिस्सा
मूलरूप से पंजाब के जिला गुरदासपुर के रहने वाले जेके बेदी ने बताया कि इस नेक कार्य के लिए उन्होंने एक गुल्लक बनाकर रखा है। संपत्ति से जो भी मुनाफा होता है, उसमें से एक निर्धारित राशि डाल दी जाती है। साल में जो रुपये इकट्ठे होते हैं, उसमें और मिलाकर बेटियों की शादी का इंतजाम करते हैं। इसके अलावा बेदी बच्चों को शिक्षित करने पर भी जोर दे रहे हैं। इसकी जिम्मेदारी उन्होंने अपने गांव के स्कूल के प्रिंसिपल को दे रखी है। जो बच्चा स्कूल में पढ़ना चाहता है और फीस भरने में सक्षम नहीं है, उसकी फीस प्रिंसिपल के कहने पर बेदी भरते हैं। उन्होंने स्कूल में बच्चों के लिए मूलभूत सुविधाओं से लेकर खेल तक की सभी व्यवस्थाओं को दुरुस्त कराया है। उन्होंने बताया कि अभी वह एक बच्ची को बीसीए और एक को बीएड करवा रहे हैं।
अश्विनी मुंजाल 152 बार कर चुके हैं रक्तदान
पीजीआई में कार्यरत अश्विनी कुमार मुंजाल, जो अब तक 152 बार रक्तदान कर चुके हैं। उन्हें इसकी जानकारी नहीं है कि उनका खून कहां और किस को दिया गया। उन्होंने तो बस जरूरतमंदों की जिंदगी बचाने के लिए रक्तदान अभियान का क्रम जारी रखा है। अश्विनी ने कॉलेज के समय से रक्तदान शुरू किया था, जो आज तक बिना बाधा के जारी है। 60 साल की उम्र में भी वह हर तीन महीने में रक्तदान करते हैं।
उन्होंने बताया कि पीजीआई कर्मचारी संघ के अध्यक्ष के तौर पर एक बार आंदोलनरत होने पर उन्हें जेल भी जाना पड़ा था। उस दौरान रक्तदान की तिथि आने पर उन्होंने जेल प्रशासन से अनुमति लेकर रक्तदान किया था। अश्विनी का कहना है कि रक्तदान के जरिए हम अजनबी से खून का रिश्ता जोड़ते हैं। रक्तदान के जरिए हम किसी की अनमोल जिंदगी बचा सकते हैं। वह अपने साथ ही यूनियन के युवा सदस्यों को भी इस महादान के लिए उत्साहित करते हैं। उनका कहना है कि अगर जिंदगी में खुशियों के रंग बिखेरने हैं तो रक्तदान करके देखिए।
बच्चियों के सपनों को लगे पंख, यही मेरा लक्ष्य: नीना दीप
बच्चे भी पक्षियों की तरह होते हैं, उन्हें जितना खुला छोड़ोगे, वह उतनी ही ऊंची उड़ान भरेंगे। जो बच्चे उड़ान भरना चाहते हैं, आर्थिक रूप से कमजोर होने के कारण उनके लक्ष्य पर कोई प्रभाव न पड़े, इसके लिए उनके सपनों को मैं अपना लेती हूं। उनके सपनों में रंग भरना ही मेरा लक्ष्य होता है, यह कहना है कि सेक्टर-36 निवासी नीना दीप का।
नीना ने हाल ही में दो बच्चियों को गोद लेकर उनकी पढ़ाई का पूरा जिम्मा उठाने का फैसला किया है। नीना ने बताया कि लड़कियां पढ़ लिखकर आत्मनिर्भर बनें, यही उनका प्रयास रहता है। इसलिए सरकारी स्कूलों में जाकर विद्यार्थियों की काउंसलिंग करती हैं। काउंसलिंग के दौरान शिक्षकों को कहा जाता है कि अगर कोई विद्यार्थी फीस के अभाव में पढ़ाई नहीं कर पा रहा तो जानकारी दें, वे उनका खर्चा वहन करेंगी।
नीना दीप मूलरूप से लेखन कार्य से जुड़ी हैं। नीना ने बताया कि उन्होंने जीएमएसएसएस-36 की नौंवी की दो छात्राओं को पढ़ाई के लिए गोद लिया है। परिवार आर्थिक तंगी में है लेकिन दोनों लड़कियां पढ़ना चाहती हैं। एक का सपना डॉक्टर बनना और एक भविष्य में शिक्षिका बनना चाहती है। स्कूल की मदद से उनके बारे में जानकारी मिली तो उनकी पढ़ाई पूरी करवाने की जिम्मेदारी ली। उन्होंने बताया कि पहले बच्चियों को किताबें व अन्य सामान देते थे, पहली बार दो बच्चियों की जिम्मेदारी भी संभाली है।
ये हैं चंडीगढ़ के आनंद, बॉक्सिंग से संवार रहे गरीब बच्चों की जिंदगी
कई प्रतियोगिताओं में बॉक्सिंग चैंपियन रहे आनंद अब कालोनी के गरीब बच्चों की जिंदगी में सफलता के रंग भर रहे हैं। मलोया में वह तीन वर्ष से एक बॉक्सिंग अकादमी चला रहे हैं, जहां आसपास की कालोनियों के बच्चे बॉक्सिंग, फिटनेस और योग सीखते हैं। अकादमी के बच्चे अब विभिन्न चैंपियनशिप में हिस्सा लेकर पदक जीत रहे हैं।
आनंद ने बताया कि वह वर्ष 1989 से बॉक्सिंग कर रहे हैं। स्कूल स्तर पर वह जूनियर, सीनियर वर्ग में चैंपियन रहे। पंजाब यूनिवर्सिटी में भी उन्होंने चार गोल्ड मेडल अपने नाम किए फिर महसूस हुआ कि क्यों न कालोनी के गरीब बच्चों का भविष्य संवारा जाए। कालोनी के बच्चों में बहुत जान होती है और खेल ही एक ऐसा माध्यम है, जिससे वह अपनी जिंदगी बदल सकते हैं। खुद को कालोनी के माहौल से बाहर ले जा सकते हैं। इसी सोच के साथ करीब तीन साल पहले मलोया में एक अकादमी खोली और बच्चों को मुफ्त ट्रेनिंग देनी शुरू की।
आनंद ने बताया कि हाल ही में स्टेट लेवल के चैंपियनशिप में उनकी अकादमी के 20 बच्चों ने हिस्सा लिया था। इनमें से 13 बच्चे मेडल लेकर आए, जिसमें तीन स्वर्ण, 6 रजत, 4 कांस्य पदक शामिल हैं। बताया कि अकादमी में 50 बच्चे हैं लेकिन परीक्षाओं की वजह से अभी 25 आ रहे हैं। सीखने आने वाले बच्चे गरीब हैं, इसलिए बॉक्सिंग ग्लव्स, जूते आदि वही खरीद कर देते हैं। लड़कियों को सेल्फ डिफेंस की ट्रेनिंग भी देते हैं, क्योंकि इसमें स्कोप है और इससे उनकी जिंदगी सुधर सकती है।
आनंद ने कहा कि वो अपने स्तर पर बहुत कोशिश कर रहे हैं लेकिन प्रशासन का सहयोग नहीं मिल रहा। वह चाहते हैं कि बॉक्सिंग सिखाने के लिए कम्युनिटी सेंटर में जगह मिल जाए ताकि बच्चों को बार-बार जगह न बदलनी पड़े। सरकार सहयोग करे तो वो इस अकादमी को बहुत आगे ले जाना चाहते हैं।