पांच जून 1940 को जब ऊधम सिंह को फांसी की सजा सुनाई गई, तब उन्होंने कठघरे की रेलिंग पर मुक्का मारा और ब्रिटिश हुकूमत का उपहास उड़ाया और जोरदार भाषण देकर ब्रिटिश साम्राज्यवाद की पोल खोली।
ऊधम सिंह ने अपना भाषण ब्रिटिश साम्राज्यवाद की निंदा के साथ शुरू किया। उन्होंने कहा कि मैं ब्रिटिश साम्राज्यवाद का नाश करने की बात कहता हूं। आप कहते हैं कि भारत में शांति नहीं है। हमारे पास केवल गुलामी है। तथाकथित सभ्यता की पीढ़ियों ने हमें मानव जाति के लिए ज्ञात हर गंदी और पतित चीज दी है। आपको बस अपना इतिहास पढ़ना है। अगर आपमें थोड़ी भी मानवीय शालीनता है, तो आपको शर्म से मर जाना चाहिए। दुनिया में खुद को सभ्यता का शासक कहने वाले तथाकथित बुद्धिजीवियों द्वारा जिस क्रूरता और खून के प्यासे तरीके से पेश आया गया है, वह खूनी है...
भारत की सड़कों पर मशीनगनों ने हजारों गरीब महिलाओं और बच्चों को कुचल दिया है, जहां भी आपके तथाकथित लोकतंत्र और ईसाई धर्म का झंडा फहराता है। मैं ब्रिटिश सरकार के बारे में बात कर रहा हूँ। मुझे अंग्रेज लोगों से कोई खास शिकायत नहीं है। भारत की तुलना में इंग्लैंड में मेरे ज्यादा अंग्रेज दोस्त रहते हैं। इंग्लैंड के मजदूरों के साथ मेरी सहानुभूति है। मैं साम्राज्यवादी सरकार के खिलाफ हूं। भारत में सिर्फ गुलामी है। हत्या, अंग-भंग और विनाश-ब्रिटिश साम्राज्यवाद। लोग इसके बारे में अखबारों में नहीं पढ़ते। हम जानते हैं कि भारत में क्या चल रहा है।
आप मुझसे पूछते हैं कि मुझे क्या कहना है, मैं यही कह रहा हूं। क्योंकि आप लोग गंदे हैं। आप हमसे यह नहीं सुनना चाहते कि आप भारत में क्या कर रहे हैं। इसके बाद उन्होंने अपना चश्मा जेब में डाला और हिंदुस्तानी में तीन शब्द बोले-ब्रिटिश साम्राज्यवाद मुर्दाबाद!