गोशे बीमारी में लिवर और तिल्ली बढ़ जाती है जिससे खून की कमी हो जाती है। ग्रोथ हॉरमोन डिफिशिएंसी में दिमाग विकसित नहीं हो पाता इसके कारण बच्चों को पढ़ने में भी समस्या आती है। एमपीएस बीमारी में बच्चों को पेट, सांस, कान, गुर्दे, दिमाग, दिल में इंफेक्शन हो सकता है।
आज रेयर डिजीज डे है। वैसे तो 7000 रेयर डिजीज है, लेकिन जरूरी नहीं कि यह भारत में पाई जाएं। इनमें तीन रेयर डिजीज गोशे डिजीज, ग्रोथ हॉरमोन डिफिशिएंसी और म्यूको पोली सेकेराडोसिस शामिल हैं, जिनके बारे में पीजीआई स्थित बाल विभाग की प्रोफेसर डॉक्टर इनुषा पाणीग्राही ने जानकारी दी।
क्या हैं तीन रेयर डिजीज
गोशे बीमारी से बचने के लिए 15 दिन में तीन बॉयल यानि इंजेक्शन लगाने जरूरी होते हैं जिस पर 6 महीने में लगभग 13 लाख रुपये का खर्च होता है। प्राइवेट में यह खर्च और भी ज्यादा होता है।
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उन्होंने बताया कि इसका एक विकल्प बोन मैरो ट्रांसप्लांट है। लेकिन इसमें भी यह समस्या है कि बोन मैरो भाई बहन के साथ मैच होने की भी सिर्फ 30 प्रतिशत संभावना होती है। आजकल परिवार छोटे हैं तो घर में बोन मैरो मैच होना मुश्किल होता है। सरकारी अस्पताल में बोन मैरो ट्रांसप्लांट के 15 से 20 लाख रुपये खर्च होते हैं। प्राइवेट में यह खर्चा 30 से 50 लाख तक होता है।
यदि परिवार में किसी को पहले से ऐसी बीमारी है, तो गर्भवती महिलाओं को पहले ही टेस्ट करवा लेने चाहिए। उन्होंने कहा कि ब्रेन की ग्रोथ ढाई साल के भीतर हो जाती है यदि बच्चों के हाथ, कान या पैर छोटे बड़े दिखते हैं तो तुरंत टेस्ट करना चाहिए। लेकिन इन टेस्ट का खर्चा भी डेढ़ हजार से लेकर 15 हजार तक होता है। प्राइवेट में यह खर्च 10 से 25 हजार तक होता है। यदि बच्चा मंदबुद्धि है तो उसका इलाज नहीं होता। इन बीमारियों का असर 30 से 35 साल तक भी दिखाई देता है। इन बीमारियों के टेस्ट भी अलग होते हैं, डॉक्टर अपने अनुभव के आधार पर बीमारी को पहचानकर टेस्ट बताते हैं। जेनेटिक टेस्ट में भी कई बार यह सामने नहीं आते।