पिछले साल के आंकड़ों पर गौर करें तो रेप के मामलों में सजा पाने वालों की संख्या के मुकाबले बरी होने वालों की संख्या बढ़ रही है। चार साल के आंकड़ों से साफ है कि सजा का प्रतिशत लगातार गिर रहा है। वहीं, बरी होने वालों का आंकड़ा लगातार बढ़ रहा है। चंडीगढ़ जिला अदालत में दुराचार और महिला अपराध के मामलों की सुनवाई के लिए विशेष कोर्ट गठित की गई है।
हालांकि, यह आम केसों के मुकाबले ट्रायल बहुत स्पीडी है। इससे केसों का निपटारा बहुत जल्द हो जाता है। स्पेशल कोर्ट के गठन के बाद से निपटाए गए दुराचार के मामलों में साल दर साल गौर करें तो 2014 में कुल 96 केस निपटाए गए। इनमें से 67 केस में आरोपी बरी हुए तो 29 केस में दोषियों को सजा। 2015 में 82 रेप के केस निपटाए गए, जिनमें से 52 केस में आरोपी बरी हुए।
इस तरह बरी होने वालों का प्रतिशत सजा के 36.5 के मुकाबले 63.5 फीसदी रहा। 2016 में दुराचार के 105 मामलों में विशेष अदालत ने फैसला सुनाया। इनमें से 60 फीसदी मामलों में कुल 64 आरोपी बरी हुए, जबकि 41 मामलों में सजा सुनाई गई। वर्ष 2017 में विशेष कोर्ट ने तेजी से मामले निपटाते हुए 131 मामलों में फैसला सुनाया। वहीं, अप्रत्याशित रूप से 88 मामलों में आरोपी बरी हुए।
इस साल बरी होने वालों का प्रतिशत 67 रहा, जबकि सजा का प्रतिशत 33 रहा। एडवोकेट रबिंद्रा पंडित का मानना है कि दुराचार जैसे संगीन मामलों में आरोपियों के बरी होने का सबसे बड़ा कारण शिकायतकर्ता या पीड़िता का अदालत में बयान से मुकरना है। अधिकतर मामलों में पीड़िता आरोपी को पहचानने से इनकार कर देती है या पुलिस के समक्ष दिए बयान के विरीत अदालत में बयान देती है।
वहीं, एडवोकेट प्रतिभा भंडारी का मानना है कि कई बार आरोपियों के खिलाफ झूठा केस बना दिया जाता है। पीड़िता पहले खुद अपनी मर्जी से आरोपी से शारीरिक संबंध बनाती है और बाद में पारिवारिक दबाव या अन्य कारणों से शिकायत दे देती है।