पंजाब कला भवन में चल रहे रंधावा उत्सव के दौरान सोमवार को बेगानी बोहड़ दी छां नाटक का मंचन किया गया। इस नाटक को अजमेर औलख ने लिखा और इसका निर्देशन वीणा धीर ने किया। नाटक की कहानी एक गांव के परिवार के इर्द गिर्द घूमती है।
इस परिवार का मुखिया गज्जन गांव में घर के पास बोहड़ के पेड़ की छाया में आराम करने जाता है। लेकिन हर बार घर की कोई न कोई समस्या उसे वहां आराम नहीं करने देती। जब वह आराम करने लगता है, तभी गांव का बनिया अपने पैसे वसूलने उसके पास आ जाता है। कभी उसके छोटे भाई की बीवी वहां पहुंचकर शिकायतें करने लगती है।
एक दिन जब वह फिर बोहड़ के पेड़ के नीचे आराम करने बैठता है तो उसे पता लगता है किसी ने खेत के पानी को लेकर अलग रास्ता बना लिया है। इसपर उसे छोड़कर परिवार के अन्य रिश्तेदार लड़ाई करने निकल पड़ते हैं। गज्जन वहीं पेड़ के नीचे बैठे सोचता रहता है कि पता नहीं लड़ाई में मेरे परिवार के लोगों को चोटें लगी होंगी, वह ठीक भी है या नही।
इस बारे में सोचता रहता है। यही चीजें सोचते सोचते वह बीमार हो जाता है। अंत में उसे अहसास होता है कि पेड़ की छाया में वह कुछ पल आराम करना चाहता था, असल में वह बेगाना है। यानी बेगानी बोहड़ दी छां हैं।