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जब सीता के रोल के लिए छोटा खान का धर्म नहीं आता था आड़े

Sun, 21 Sep 2014 11:54 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला कैथ्ाल
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गुहला-चीका। क्या जमाना था...। जब सीता माता का रोल करने में छोटा खान का धर्म आड़े नहीं आता था। सज धजकर रावण का किरदार निभाने वाले रोबदार और कद्दावर गुरबख्श सिंह को रामलीला कभी भी सिर्फ हिंदुओं की नहीं लगती थी। दरअसल, यह साठ और सत्तर के दशक की बातें है।
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उस दौर में दूर दराज के गांवों में ब्याही गुहला के गांवों की लड़कियों रामलीला मंचन के दिनों में अपने बच्चों को लेकर पीहर लौट आती थी और दशहरे की धोक मारने के बाद ही अपनी ससुराल वापस जाती थीं। कुछ ऐसे ही किस्से ‘अमर उजाला’ के साथ सांझा किए रामलीला में बरसों तक लक्ष्मण का रोल करने वाले रिटायर्ड हेड मास्टर अजमेर सिंह ने। उन्होंने बताया कि न बिजली थी और न ही साउंड सिस्टम...। लेकिन जो रंग जमता था। उसे याद कर पुराने जमाने के लोग आज भी खिल उठते हैं।

पहली बार बिजली आते ही स्टेज जगमगा गई
मास्टर अजमेर सिंह बताते हैं कि 56 साल पहले चीका गांव में ब्राह्मणों की थ्याई के पास पड़ी खाली जगह में शुरू हुई रामलीला 1968 में भवानी मंदिर चीका के मैदान में स्थानांतरित हो गई। रामलीला में शुरुआती डायरेक्टरों में से एक तेलू राम पाधा के पुत्र सुभाष पाधा बताते हैं कि भवानी मंदिर में जब पहली बार रामलीला का आयोजन हुआ तो उद्घाटन करने कैथल की विधायक ओमप्रभा जैन पहुंची।
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उसी साल में चीका में पहली बार बिजली आई थी और रोशनी से रामलीला की स्टेज जगमगा उठी थी। पाधा बताते हैं कि मनोरंजन के साधनों का अभाव कहिये या धार्मिक परंपराओं में आस्था...। लोग दूर-दूर से झोटा बुग्गियों और बैल गाड़ियों में सवार होकर भवानी मंदिर की रामलीला देखने आते थे। महिलाओं व लड़कियों की तादाद ज्यादा होती थी।

दिन में काम और रात को करते थे रिहर्सल
भवानी मंदिर से जुड़ी एक संस्था भवानी सेवा समिति के पूर्व कैप्टन राकेश वर्मा बताते हैं कि उस दौर में स्टेज पर दिखने की ललक इतनी ज्यादा होती थी कि गैस की हांडियां लेकर खड़े कारिंदे इस बात का इंतजार कर रहे होते थे कि कब बिजली जाए और कब वे गैस की हांडियां लेकर रोशनी करने स्टेज पर पहुंचें।

वर्मा बताते हैं कि रामलीला की रिहर्सल दो महीने पहले शुरू हो जाती थी। तमाम कलाकार चूंकि नौकरीपेशा, दुकानदार, डाक्टर, व्यापारी, किसान और मजदूर वर्ग के लोग होते थे, और सिर्फ सेवा भाव से अपनी भूमिकाएं निभाते थे, इसलिए रिहर्सल रात में ही हुआ करती थी।

वर्मा बताते हैं कि सोमनाथ शर्मा, नरदेव गुप्ता शास्त्री, पंडित तेलू राम पाधा, बशेशर राम, प्यारे लाल शर्मा रामलीला के उन सख्त मिजाज डायरेक्टरों में गिने जाते थे जो रिहर्सल के दौरान होने वाली छोटी सी गलती पर भी अक्सर बुरी तरह डपट देते थे, लेकिन डांट-डपट कोई स्थायी भाव नहीं था। रिहर्सल कलाकारों के लिए हंसी मजाक और कुछ नया सीखने का दौर होता था।

24 से शुरू होगी रामलीला
भवानी मंदिर में रामलीला कमेटी, श्री आदर्श नाटक क्लब 24 सितंबर से रामलीला का आयोजन शुरू करेगी। आदर्श नाटक क्लब के मौजूदा प्रधान राजीव शर्मा बताते हैं कि रामलीला की आय से आज एसडी सीनियर सेकेंडरी स्कूल चलाया जा रहा है, जिसमें एक हजार से अधिक बच्चे तालीम लेते हैं।
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