1993 में तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने भी सुप्रीम कोर्ट जैसा ही प्लान तैयार किया था, जिसको विश्व हिंदू परिषद ने उस वक्त नकार दिया था, जिसमें विवादित स्थल पर आलीशान राम मंदिर व पास ही में मस्जिद के निर्माण की बात कही थी, लेकिन वीएचपी ने 18 किलोमीटर के दायरे में कोई और धार्मिक स्थल न बनने की बात कहकर उसका विरोध किया था। यहां तक कि 1988 में राजीव गांधी ने ही राम मंदिर का शिलान्यास किया था, जबकि खुद भाजपा के पूर्व केंद्रीय मंत्री रह चुके शाहनवाज हुसैन ने संसद में ये बयान दिया था कि रामलला की स्थापना भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने की थी।
यहां सिर्फ और सिर्फ राजनीति की जा रही है। आधे-अधूरे मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा अपने हित और वोट बैंक के लिए किया जा रहा है। विरोध में हो जाए वही इनका दुश्मन हो जाए, चाहे वो शंकराचार्य हो या कोई और इनको किसी से फर्क नही पड़ता, सत्ता के लिए ये कुछ भी करेंगे। इसलिए सोनिया गांधी, राहुल व शंकराचार्य भी मोदी के भाजपा की महिमा सुनने नहीं जा रहे हैं। चुनाव तक पीएम मोदी मंदिरों के विकास पर जोर देंगे, क्योंकि उनके पास 10 साल का हिसाब देने से बचने के लिए सिर्फ यही एक रास्ता बचा है।