चंडीगढ़। निजी जीवन के संबंध और एक-दूसरे को करीब से जानने का अंदाज फिल्म आनंद में देखने को मिलता है। फिल्म की कहानी लिखते समय मुख्य किरदार आनंद के लिए ऋषिकेश मुखर्जी अपने दिमाग में राजकपूर को लेकर चल रहे थे। 1954 के करीब कहानी लिखते समय वह सोच रहे थे कि राजकपूर ही आनंद के किरदार में फिट बैठेंगे। ये किस्से वक्ता अमूल्य शुक्ला रविवार शाम को कार्यक्रम काव्यांजलि में फिल्म आनंद और निर्देशक व कहानीकार ऋषिकेश बनर्जी पर चर्चा के दौरान सुना रहे थे।
अमूल्य ने आगे बताया कि पूरी कहानी लिखने के कुछ साल बाद ऋषिकेश दा ने फिल्म पर काम करने के लिए सोचा, लेकिन उस दौरान राजकपूर की तबीयत सही नहीं थी और वह अस्पताल में थे। राजकपूर के स्वस्थ होने पर वह उनके पास फिल्म आनंद की कहानी लेकर जाते हैं जो उन्हें बहुत पसंद आती है पर कुछ दिन सोचने के बाद वह कहते हैं कि फिल्म में आनंद युवा किरदार है, उनका इसके साथ तारतम्य नहीं बैठेगा। वह उन्हें अपने छोटे भाई शशि कपूर से इस किरदार के लिए बात करने को कहते हैं, लेकिन शशि ने कहा कि वह रोमांटिक हीरो के किरदारों में ही खुश हैं।
फिल्म में आनंद सहगल (राजेश खन्ना) अपने प्रिय दोस्त डॉक्टर भास्कर बनर्जी (अमिताभ बच्चन) को 'बाबू मोशाय' कहकर संबोधित किया करते थे। यह शब्द राजकपूर ने दिया था और राजकपूर ऋषिकेश दा को बाबू मोशाय कहा करते थे। इन कारणों की वजह से ऋषिकेश दा ने फिल्म की शुरुआत में क्रेडिट भी राज कपूर को दिया है।
किशोर कुमार के चौकीदार ने बिना पूछे ऋषि दा को लौटाया
जब ऋषि दा फिल्म के किरदार के लिए किशोर कुमार के पास जाते हैं तो उनके चौकीदार बिना पूछे ही उन्हें लौटा देते हैं। उस समय किशोर का किसी बंगाली ऑर्गेनाइजर के साथ रुपयों को लेकर कुछ मसला चल रहा होता है। पैसे नहीं मिलने से तंग आकर किशोर चौकीदार को बोल देते हैं कि कोई भी बंगाली धोती-कुर्ते में आए, उन्हें बोल देना कि किशोर घर पर नहीं हैं। जब उन्हें पता चलता है कि ऋषि दा उनके घर आनंद का किरदार लेकर आए थे तो उन्हें दुख हुआ।
महामारी के समय में जिंदगी जीने की चाह सिखाने वाली कहानी
अमूल्य किस्सों के दौरान बताते हैं कि पहले ऋषि दा फिल्म के गाने ‘जिंदगी कैसी है पहेली’ को बैकग्राउंड संगीत के रूप में लेकर चलते हैं और शूटिंग भी पूरी हो जाती है, लेकिन जब राजेश खन्ना इस गाने को सुनते हैं तो वो बोलते हैं कि इस तरह गाने की गहराई दर्शक नहीं समझ पाएंगे। योगेश का लिखा यह गाना जिंदगी जीने की सीख देने वाला है, इस तरह इस गाने का फलसफा व्यर्थ हो जाएगा। इसके बाद में इस गाने के लिए अलग से शूटिंग होती है और इसे फिल्म के बीच में फिट किया जाता है, जो आज भी महामारी के समय में हमें जिंदगी जीने की चाह सिखाता है।