चंडीगढ़। पूर्व मानव संसाधन विकास मंत्री डॉ. मुरली मनोहर जोशी ने कहा कि प्रकृति का दोहन करें, लेकिन शोषण न करें। प्रकृति और मनुष्य का रिश्ता मां-बेटे जैसा है, इसलिए जितनी जरूरत है प्रकृति से उतना ही लें, संतुलित व्यवहार रखना चाहिए। उन्होंने उदाहरण देकर समझाया कि भूख लगना प्रकृति है, भूख लगने पर किसी का निवाला छीन लेना विकृति और बांटकर खाना संस्कृति है।
डॉ. जोशी रविवार को पंचनद शोध संस्थान, पंजाब यूनिवर्सिटी के पर्यावरण विभाग व चंडीगढ़ प्रशासन के पर्यावरण विभाग की ओर से पर्यावरण एवं जल की वैश्विक समस्या व समाधान विषय पर आयोजित व्याख्यान माला के दूसरे दिन जिज्ञासा समाधान सत्र में प्रतिभागियों के प्रश्रों के उत्तर दे रहे थे। जिज्ञासा समाधान सत्र में कई ऐसे प्रश्न आए जिनका उत्तर उन्होंने हाजिर जवाबी के साथ दिया।
उन्होंने कहा, मनुष्य जाति को प्रकृति के साथ सामंजस्य बैठाकर ही आगे बढ़ना चाहिए। घरों के भी ऐसे मॉडल बनाने की जरूरत है जिससे की ऊर्जा की खपत कम से कम हो और प्राकृतिक संसाधनों का शोषण कम किया जा सके। एक सवाल के जवाब में उन्होंने मिट्टी के बर्तनों में पानी रखने की सलाह दी, लेकिन ऐसा किया जाने पर आपको बैकवर्ड की संज्ञा दे दी जाएगी, जो कि एक गलत धारणा है। प्लास्टिक के प्रयोग को कम किया जाए।
स्मार्ट सिटी पर चुटकी लेते हुए कहा
मुझे दुनिया में एक ऐसा शहर बता दीजिए जो एक स्मार्ट सिटी हो, यह एक छलावा है। उन्होंने जल सरंक्षण पर विशेष जोर दिया। हर व्यक्ति को अपनी आवश्यकताएं सीमित करनी होंगी, पानी की जितनी जरूरत है, उतना ही इस्तेमाल किया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि पश्चिमी सभ्यता और भारतीय सभ्यता की बुनियादी सोच में एक बहुत बड़ा फर्क है। उनका मॉडल प्रकृति के शोषण पर आधारित है जबकि हमारे यहां तो आदिकाल से ही सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय का पाठ पढ़ाया जाता है। आज की दुनिया की बहुत सी मुसीबतों की जड़ उन्होंने मार्केट इकॉनमी पर आधारित व्यवस्थाओं को बताया। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चाइना का झगड़ा भी मार्केट शेयर को लेकर ही है।
हर चीज का समाधान मनुष्य के अंदर
डॉ. जोशी ने जीडीपी के बारे में कहा कि किसी देश के विकास को मापने का यह पैमाना ही गलत साबित हो रहा है, क्योंकि बढ़ी हुई जीडीपी का मतलब समुचित विकास नहीं, बल्कि जिन देशों की जीडीपी ज्यादा है, वहां अपराध, ड्रग्स, डिप्रेशन अधिक है। भले ही भूटान छोटा देश है, लेकिन उसने जीडीपी के पैमाने को नकार दिया उसने ग्रॉस हैप्पिनस इंडक्स को माना है। जीडीपी की बढ़ोतरी से प्रकृति का शोषण भी बढ़ेगा।
भौतिकी से इस विषय को जोड़ते हुए बताया
उन्होंने भौतिकी से इस विषय को जोड़ते हुए बताया कि लगभग 40 साल के अध्ययन के बाद अब पश्चिमी वैज्ञानिक भी यह मानने लग गए हैं कि हर चीज का समाधान मनुष्य के अंदर ही छिपा है। डॉ. जोशी ने कुछ आध्यात्मिक बात भी बताई कि अब तो यूएनओ की मीटिंग में भी मानसिक शांति के लिए प्राणायाम कराया जाता है, भारत को नकल नहीं करनी बल्कि मौलिक होना है तभी यह विश्व गुरूबनेगा। इसी भारतीय चिंतन के आधार पर भारत विश्व गुरू बनेगा। सांस्कृतिक जीवन मूल्यों का निर्वहन करते हुए ही आगे बढ़ना है।
फैल रहा है कैंसर
पूर्व लोकायुक्त एवं नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल की एक कमेटी के चेयरमैन जस्टिस प्रीतमपाल सिंह ने कुछ ऐसे उदाहरण देकर समझाया कि किस तरह से जल प्रदूषण हो रहा है। उन्होंने कहा, व्यास के पास एक शुगर मिल के प्लांट के सीरे ने डेढ़ लाख से 2 लाख मछलियां मार दी, लुधियाना के बूढ़ानाला का पानी सतलुज में जाता है, जिससे आगे जहां पर यह पानी जाता है उस एरिया में कैंसर जैसी बीमारी हो रही हैं।
जस्टिस प्रीतमपाल ने बलबीर सिंह सींचेवाला का उदाहरण देकर कहा कि उन्होंने जल प्रदूषण को रोकने के लिए प्रेेरणादायक कार्य किए हैं। कार्यक्रम की अध्यक्षता पूर्व लोकायुक्त जस्टिस प्रीतमपाल सिंह ने की। इस मौके पर विशिष्ट अतिथि पीयू वीसी डॉ. राजकुमार, डॉ. केएस आर्य, पंचनद शोध संस्थान के निदेशक प्रो. बीके कुठियाला, पीयू पर्यावरण विभाग की अध्यक्ष डॉ. सुमन मोर आदि रहीं।