आपने नाटक खूब देखे होंगे पर शायद ही एक नाटक के पीछे छुपी अथक मेहनत से आपका वास्ता पड़ा हो। दो घंटे के एक नाटक के लिए कलाकार से लेकर स्टेज डिजाइन करने वाले तक एक माह तक पसीना बहाते हैं। मंच सज्जा करने वालों की माने तो नाटक की सफलता का दारोमदार इसी पर होता है।
पंजाब यूनिवर्सिटी के थिएटर डिपार्टमेंट की पूर्व चेयरमैन और वरिष्ठ रंगकर्मी नीलम मान सिंह ने कहा कि डिजाइन नाटक का अहम हिस्सा है। कैरेक्टर हमेशा स्पेस के संग रिश्ता बनाते हैं।
टेक्सचर के लिहाज से ही मंच को तैयार किया जाता है। उसी तरह से आब्जेक्ट लगाए जाते हैं। स्टेज डिजाइन करते वक्त नाटक की थीम देखनी होती है। कैरेक्टर में क्या बदलाव आ रहे हैं और उसको देखना आवश्यक होता है।
मंच सज्जा के दौरान नाटक की बैकग्राउंड जरूरी है। कमेडी नाटक है तो चमकदार रंग इस्तेमाल किए जाते हैं। ट्रेजडी नाटक है तो गहरे रंग का इस्तेमाल होता है। नाटक चिंताओं से भरा है तो उसमें टेक्सचर खुरदरा सा होता है।
वरिष्ठ रंगकर्मी केवल धालीवाल ने कहा कि सारा थीम नाटक पर होता है। नाटक ऐतिहासिक है या मुगल पीरियड का है तो उसकी आर्ट्स होंगी, ऐतिहासिक सीढ़ियां होंगी।
कई स्थितियां ऐसी होती हैं कि नाटक का स्टेज कपड़ों से भी तैयार किया जाता है। अब कई नाटक ऐसे भी हैं जिनमें मॉडर्न रंगों का इस्तेमाल किया जाता है।
अलंकार थिएटर ग्रुप के निदेशक चक्रेश ने कहा कि स्टेज सजाने के लिए कबाड़ का सामान सबसे ज्यादा उपयोगी होता है। डिजाइनर्स के पास इतनी जगह नहीं होती है कि वह सामान रखें।
इसीलिए कबाड़ियों से सामान खरीदते हैं और फिर उसका उपयोग करके उनको ही बेच देते हैं। उन्होंने कहा कि काफी सामान तो आर्टिस्टों के घर से आता है। टेबल वगैरा की जरूरत होती है तो कबाड़ी से ले लेते हैं।