पंजाब भाजपा ने फिर कांग्रेस छोड़कर आए पूर्व विधायक को नया प्रदेशाध्यक्ष बनाया है। पूर्व सीएम कैप्टन अमरिंदर समेत एक बड़ा पूर्व कांग्रेसी कैंप भाजपा के पास मौजूद है। संगठन सक्रिय पर दमदार चेहरों के लिए भाजपा बाहरी नेताओं के भरोसे है।
पंजाब में भाजपा का संगठन तो बरसों से सक्रिय है मगर मजबूत जनाधार के लिए आज तक जूझ रहा है। गेमचेंजर और दमदार सिख चेहरों की दरकार के साथ-साथ पंथक सियासत में भी पार्टी की पैठ अभी थोड़ी कमजोर है। इसी वजह से भाजपा को पंजाब में अपने बड़े सियासी लक्ष्य पाने के लिए बाहरी नेताओं पर भरोसा करना पड़ रहा है।
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ऐसा नहीं है कि सूबे में भाजपा के पास समर्पित नेताओं की कमी है मगर पंजाब सियासत के जानकार परमजीत सिंह और हरबंस सिंह मानते हैं कि इन नेताओं में फिलहाल ऐसे चेहरे नहीं दिखते जिनके दम पर भाजपा पंजाब में भी पश्चिम बंगाल जैसा खेला कर सके। लिहाजा भाजपा का फोकस आने वाली समय में जोड़-तोड़ की राजनीति पर ज्यादा रह सकता है जिसकी शुरुआत हो चुकी है।
उधर, संयुक्त पंजाब में आरएसएस की सक्रियता देखें तो साल 1937 में संघ का कार्य शुरू हो चुका था। बंटवारे के बाद भी संघ ने पंजाब में धीरे-धीरे अपनी जड़ें जमानी शुरू कर दीं। वर्षों तक शहरों के अलावा ग्रामीण इलाकों में संघ का अच्छा असर दिखा मगर जैसे-जैसे सूबे की सियासत में पंथक फैक्टर का दखल बढ़ता गया तो संघ के लिए चुनौतियां खड़ी होने लगीं। गांवों में संघ का प्रभाव कमजोर पड़ने लगा। बड़ा सिख वोटर धीरे-धीरे पंथक दलों की ओर खिसकने लगा। इसी वजह से संघ के प्रभाव का असर भाजपा को बड़ा फायदा दिलवाने में कामयाब नहीं हुआ।
समय के साथ भाजपा ने पंजाब में अपने सियासी लक्ष्य की चाहत को बरकरार रखते हुए सूबे की सबसे पुरानी व बड़ी पंथक पार्टी शिरोमणि अकाली दल (शिअद) के साथ गठबंधन कर लिया। फायदा यह मिला कि 1997, 2012 और साल 2017 में शिअद के साथ मिलकर सरकार भी बनाई। यहां भी ग्रामीण वोटरों को तो शिअद साधती थी जबकि शहरी मतदाताओं पर भाजपा की पकड़ रहती थी। साल 2020 के अंत में भाजपा और शिअद का गठबंधन टूट गया और पंजाब के भाजपा नेताओं ने हाईकमान के समक्ष एकला चलो की इच्छा जताई।
साल 2022 का विधानसभा और साल 2024 का लोकसभा चुनाव भी अकेले लड़ा। 2025 के पंचायत और साल 2026 के निकाय चुनाव भी पार्टी ने अकेले ही लड़े। भाजपा की चुनौतियां बढ़ी मगर साल 2024 के लोकसभा चुनाव में 18.56 प्रतिशत वोट बैंक लेकर पार्टी ने यह जता दिया कि पंजाबी भाजपा को चाहते हैं। इस उपलब्धि की तारीफ 14 मार्च को हुई मोगा रैली में गृहमंत्री अमित शाह ने भी मंच से की। उसके बाद अब निकाय चुनाव में भी भाजपा ने 49 से बढ़कर 172 सीटें जीतीं।
सधी रणनीति भी चाहिए
भाजपा हाईकमान इस बात को समझ रहा है कि पंजाब में सियासी जमीन धीरे-धीरे मजबूत हो रही है मगर साल 2027 के विधानसभा चुनाव में यदि बड़ा सियासी उल्टफेर करना है तो ऐसा दमदार चेहरों के साथ सधी रणनीति भी चाहिए जिसके बूते शहरी के साथ-साथ ग्रामीण मतदाताओं को भी साधा जा सके। भाजपा के भीतर बाहरी नेताओं का एक बड़ा कैंप बन चुका है जिसमें कांग्रेस की ओर से सीएम रहे कैप्टन अमरिंदर सिंह, अध्यक्ष रहे सुनील जाखड़, सांसद रहे रवनीत सिंह बिट्टू समेत कई अन्य सांसद व विधायक मौजूद हैं। नए बने भाजपा के अध्यक्ष केवल ढिल्लों भी कांग्रेस से ही दो बार विधायक रह चुके हैं।
अब आप के नेताओं पर नजर
भाजपा ने सूबे में सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी के कैंप में भी हलचल पैदा कर रखी है। एक साथ सात राज्यसभा सांसदों (छह पंजाब से) का भाजपाई बन जाना चुनाव से पहले भाजपा की रोमांचकारी रणनीति का उदाहरण है। निगाहें अभी और नेताओं पर टिकी हैं। पार्टी सूत्र बताते हैं कि केंद्रीय नेतृत्व का फोकस भी इस वक्त पंजाब पर है और आने वाले समय में यहां केंद्रीय नेताओं के दाैरे भी बढ़ेंगे।
नए समीकरणों पर मंथन
भाजपा पंजाब फतेह करने के लिए नए समीकरणों पर मंथन कर रही है। पार्टी सूत्रों के अनुसार यहां ध्रुवीकरण का कार्ड बिल्कुल नहीं खेला जाएगा। हिंदू-सिख एकता को मजबूत करते हुए नशा तस्करी, गैंगस्टरवाद और बिगड़ी कानून-व्यवस्था को सरकार के खिलाफ बड़ा हथियार बनाया जाएगा। पंथक समेत दलितों और पिछड़ों की सियासत को और धार देने की तैयारी है। किसानों को साधते हुए विकास का एक नया रोडमैप पंजाबियों के सामने रखा जाएगा।