दूसरी ओर, विपक्षी दल भी विधानसभा चुनाव 2022 की तैयारियों के रूप में इस साल राज्य सरकार को हर मोर्चे पर घेरने में कोई कसर नहीं छोड़ने वाले। अकाली दल पर बरगाड़ी और बहिबल कलां कांड के सबसे बड़े आरोप हैं। पार्टी के लिए ये आरोप सिरदर्द बने हैं। जिनसे निकलकर सूबे के किसानों का समर्थन हासिल करना पार्टी की नैया पार करा सकता।
वहीं अकाली दल से गठबंधन टूटने के बाद भाजपा ने पंजाब की सभी विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने का बिगुल बजा दिया है। लेकिन किसान आंदोलन ने उसकी सारी मेहनत पर पानी फेर दिया है। अब तक पार्टी राज्य के तीन-चार जिलों तक ही सीमित रही थी और ग्रामीण इलाकों में वैसे ही भाजपा की कोई पैठ नहीं है।
आंदोलन के कारण बदले समीकरणों में भाजपा पंजाब में इस साल वजूद की लड़ाई लड़ेगी। मुख्य विपक्षी दल आम आदमी पार्टी इस साल फिर से जनसंपर्क अभियान शुरू करेगी लेकिन पार्टी की मुश्किल ऐसे कद्दावर नेता की कमी है, जो राज्य में अपने बूते पर पार्टी को मजबूती से स्थापित कर सके। वैसे किसान आंदोलन के दौरान आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस को घेरने और खुद को किसानों की प्रमुख हिमायती पार्टी साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है।