पंजाब में मिशन 2027 में भाजपा हिंदू-सिख एकता एजेंडे के साथ विरोधियों का नैरेटिव तोड़ेगी। पार्टी कार्यकर्ताओं को पहले चरण में मतदाताओं से संपर्क और संवाद बढ़ाने की जिम्मेदारी सौंपी जाएगी।
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पंजाब में मिशन 2027 के लिए भाजपा किन मुद्दों पर राजनीति करेगी, इस पर मंथन शुरू हो चुका है मगर इन मुद्दों से इतर सूबे में हिंदू-सिख एकता का एजेंडा प्रमुख रहेगा। पार्टी इस बात को साफ कर चुकी है पंजाब में एकजुटता के साथ इसी लाइन पर आगे बढ़ना है।
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पार्टी ने अपने कार्यकर्ताओं को भी आगाह कर दिया है कि वे इस एजेंडे को लेकर खासे सजग रहें।भाजपा नेताओं ने अपने कार्यकर्ताओं को आगाह करते हुए दावा किया है कि कुछ विपक्षी दलों ने सूबे में हिंदू-सिख विरोधी नैरेटिव (धारणा) सेट करना शुरू कर दिया है।
सोशल मीडिया पर इसका खूब प्रचार किया जा रहा है। कुछ कट्टरपंथी प्रभावित क्षेत्रों में ज्यादा जहर घोला जा रहा है। लिहाजा कार्यकर्ताओं को घर-घर जाकर भाजपा के एजेंडे और मुद्दों की विस्तार से जानकारी देनी होगी।
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मतदाताओं को यह बताना होगा कि भाजपा इस गुरुओं, पीरों और पैगंबरों की धरती पर सिर्फ पंजाबियों के लिए सियासत करने आई है जिसमें हिंदू, सिख, मुस्लिम समेत सभी जातियों के लोग शामिल हैं।
मतदाताओं को यह भी बताया जाएगा कि भाजपा ही पंजाब को गैंगस्टरवाद, नशा-हथियार तस्करी से मुक्ति दिलवाने के साथ-साथ सूबे को संभावित वित्तीय आपातकाल के हालात से बाहर निकाल सकती है।
शुरू होगा डोर-टू-डोर जनसंपर्क का पहला चरण
पार्टी कार्यकर्ताओं को पहले चरण में मतदाताओं से संपर्क और संवाद बढ़ाने की जिम्मेदारी सौंपी जाएगी। डोर-टू-डोर जाकर कार्यकर्ता मतदाताओं से भाजपा व उनकी नीतियों की पहचान करवाएंगे। साथ ही संवाद के जरिये यह भ्रम दूर करेंगे कि भाजपा सिर्फ हिंदूवादी पार्टी है।
शहरों के साथ-साथ ग्रामीण इलाकों में फोकस और बढ़ाया जाएगा। दरअसल, निकाय चुनावों के परिणामों के बाद पार्टी को लगता है शहर में भाजपा की पकड़ अपेक्षाकृत बढ़ी है मगर ग्रामीण इलाकों में अभी और काम करने की जरूरत है।
नए अध्यक्ष की बड़ी चुनौती
चुनाव से पहले चूंकि अब नए प्रदेश अध्यक्ष केवल सिंह ढिल्लों ने कमान संभाल ली है। ऐसे में उनके समक्ष चुनौती भी बड़ी है क्योंकि विधानसभा चुनाव के लिए समय बहुत कम बचा है। लिहाजा संगठन में नेताओं को नई जिम्मेदारियां बांटते हुए उन्हें नई टीम के साथ पंजाब फतह का लक्ष्य कम समय में पूरा करना होगा। यही उनकी असली परीक्षा होगी।
ढिल्लों को भाजपा के पुराने कैडर और बाहरी नेताओं के साथ तालमेल बिठाकर आगे बढ़ना होगा। ढिल्लों खुद चार साल पहले कांग्रेस छोड़ भाजपा में आए थे। उनके जैसे बहुत से अन्य कांग्रेसी, अकाली और आप नेता ऐसे हैं, जो अब भाजपाई बन चुके हैं। दूसरी ओर भाजपा का वे कैडर है जो बरसों से पंजाब की सियासत में झंडाबरदार रहा है, इन सभी को साथ लेकर चलना ढिल्लों के लिए चुनौती से कम नहीं होगा।