पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि जमानत पर छूटे किसी अभियुक्त की फैसले के वक्त अदालत में हाजिरी जरूरी नहीं है। यदि फैसला खिलाफ भी हो, तब भी इसे अभियुक्त की अनुपस्थिति में सुनाया जा सकता है।
एक मामले में फैसला सुनाते वक्त अभियुक्तों की अनुपस्थिति को अदालत की आपराधिक अवमानना बताते हुए हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई थी। याचिका पर जस्टिस एम.जियापाल व जस्टिस एनके सांघी की डिवीजन बेंच ने फैसला सुनाया है। कार्रवाई की मांग खारिज कर दी गई है।
चंडीगढ़ निवासी चमन लाल गोयल ने शिल्पी गुप्ता समेत सात व्यक्तियों के खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्रवाई की मांग को लेकर याचिका दायर की थी। आरोप था कि प्रतिवादियों के खिलाफ जेएमआईसी चंडीगढ़ की अदालत में एक मामला चल रहा था।
इसका फैसला पिछले साल 26 फरवरी को आया। उस वक्त प्रतिवादी कोर्ट में मौजूद नहीं थे। दलील दी गई कि अन्य प्रतिवादी आरती गर्ग को हाईकोर्ट ने ट्रायल में उसे उपस्थिति में छूट दी थी। साथ ही कहा था कि अंतिम बयान दर्ज कराने और फैसला सुनाते वक्त वह ट्रायल कोर्ट में उपस्थित रहे।
चमनलाल ने याचिका में आरोप लगाया कि शिल्पी गुप्ता व आरती गर्ग समेत अन्य प्रतिवादियों ने अंतिम बयान तो दर्ज कराए, लेकिन वह फैसला सुनाने वाले दिन ट्रायल कोर्ट में मौजूद नहीं रहे। इस दलील के साथ यह भी कहा गया कि यह अदालत के आदेश की अवमानना का मामला है, लिहाजा कार्रवाई होनी चाहिए।
डिवीजन बेंच ने चमनलाल की याचिका खारिज करते हुए अपने फैसले में कहा है कि इस मामले में ट्रायल कोर्ट ने प्रतिवादियों को बरी कर दिया है। यह भी कहा है कि यदि प्रतिवादियों को सजा मिलती, तब भी फैसले वाले दिन यदि वह मौजूद नहीं रहते तो ट्रायल कोर्ट उचित समय के लिए इंतजार कर सकती है।
इतना ही नहीं अनुपस्थिति की सूरत में भी सजा सुनाई जा सकती है। बेंच ने कहा है कि वैसे भी प्रतिवादियों की अनुपस्थिति से याचिकाकर्ता को कोई नुकसान नहीं हुआ है। यह भी कहा है कि याचिकाकर्ता ने न्यायिक अधिकारी पर भी बेवजह आरोप लगाया है। लिहाजा, याचिका खारिज की जाती है।
यह है मामला
शिल्पी गुप्ता व आरती गर्ग समेत अन्य के खिलाफ एक मामले में 26 सितंबर 1996 में जेएमआईसी चंडीगढ़ की अदालत में दोष तय हुए थे। इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी, लेकिन नौ मई 1997 को हाईकोर्ट से यह याचिका वापस ले ली गई थी।
साथ ही हाईकोर्ट ने गुप्ता व गर्ग को ट्रायल के दौरान पेशी में छूट देते हुए निर्देश दिया था कि अंतिम बयान दर्ज करते वक्त उन्हें ट्रायल कोर्ट में मौजूद रहना होगा। फैसले वाले दिन भी उन्हें उपस्थित होने को कहा गया था। इस मामले में पिछले साल 26 फरवरी को फैसला आया।
उस दिन सात अभियुक्त ट्रायल कोर्ट में मौजूद नहीं हुए। इसी कारण अदालत की आपराधिक अवमानना की कार्रवाई की मांग को लेकर हाईकोर्ट में याचिका दायर हुई थी।