पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि किसी आपराधिक मामले में सजा के आधार पर ही कर्मचारी को नौकरी से बर्खास्त नहीं किया जा सकता। यदि कर्मचारी को सजा सुनाई गई है तो उसे नौकरी से निकालने से पहले नियमानुसार सुनवाई का मौका देना जरूरी है।
दरअसल, एक कर्मचारी को सजा मिलने के बाद उसे बर्खास्त कर दिया गया। हालांकि फैसले के खिलाफ अपील करने पर उसकी सजा माफ हो गई। कर्मी को दोबारा नौकरी पर तो रख लिया गया, लेकिन उसके निलंबन की अवधि तक के वित्तीय लाभ नहीं दिए गए।
अब हाईकोर्ट ने तीन माह में याची को वित्तीय सहायता उपलब्ध कराने का निर्देश दिया है। मामला उत्तरी हरियाणा बिजली वितरण निगम के लाइनमैन धनीराम का है। धनीराम ने एडवोकेट विकास चतरथ के माध्यम से वित्तीय लाभ हासिल करने केलिए हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी।
याचिका में बिजली बोर्ड के साल 1990 में बने रेगुलेशन का हवाला दिया गया कि बगैर पक्ष सुने किसी कर्मी को नौकरी से नहीं निकाला जा सकता, लेकिन धनीराम को एक आपराधिक मामले में सजा मिलने के बाद बर्खास्त कर दिया गया था।
यहां तक कि निगम ने इस तथ्य की जांच भी नहीं की कि धनीराम आपराधिक प्रवृति का है या नहीं। हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता की दलीलों का हवाला देते हुए निगम को आदेश दिया है कि वह तीन महीने में उसे वित्तीय लाभ अदा करे।
ये है मामला
उत्तरी हरियाणा बिजली वितरण निगम के कर्मी धनीराम के खिलाफ 30 अक्तूबर 1992 को एक आपराधिक मामला दर्ज हुआ था। करनाल के जेएमआईसी ने 31 मई 2005 को उसे दोषी करार दिया। सजा के खिलाफ उसने सीजेएम कोर्ट में अपील की थी, लेकिन निगम ने जेएमआईसी से मिली सजा के आधार पर उसे 29 मई 2006 को नौकरी से बर्खास्त कर दिया था। बाद में सजा माफ होने पर उसे दोबारा नौकरी पर रखा तो गया, लेकिन नौकरी से बाहर रहने की अवधि के वित्तीय लाभ नहीं दिए गए।