फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

यौन उत्पीड़न पीड़िता की कम आयु उसकी गवाही पर संदेह का आधार नहीं बन सकती: हाईकोर्ट

Sat, 20 Oct 2018 02:34 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
विज्ञापन
हाईकोर्ट
विज्ञापन
चिल्ड्रंस होम में दो लड़कियों के यौन उत्पीड़न के मामले में 7 साल की सजा को चुनौती देने वाली याचिका पर फैसला सुनाते हुए कोर्ट ने याची को निर्दोष मानने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि पीड़िता की आयु भले ही 10 वर्ष थी लेकिन उसकी कम आयु उसकी गवाही की विश्वसनीयता पर संदेह करने के लिए काफी नहीं है। मनीष अरोड़ा चंडीगढ़ के चिल्ड्रन होम फॉर गर्ल्स में सुपरवाइजर था। वर्ष 2014 में चिल्ड्रन होम की दो बच्चियों ने उसके खिलाफ चाइल्ड हेल्पलाइन में शिकायत की थी।
विज्ञापन


सामाजिक कल्याण विभाग ने जांच की और शिकायत को सही पाकर एफआईआर करवा दी। ट्रायल के दौरान दोनों बच्चियों ने सुपरवाइजर मनीष अरोड़ा के खिलाफ बयान दिए। अरोड़ा ने अपने बचाव में कहा कि एक बच्ची महज दस वर्ष की है जबकि दूसरी शिकायतकर्ता 14 वर्ष की। एक छोटी बच्ची के बयानों को सही नहीं माना जा सकता। मामले में ट्रायल कोर्ट ने जनवरी 2015 में सुपरवाइजर को दोषी करार देते हुए 7 वर्ष की सजा सुना दी थी। मनीष ने इस सजा के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील की थी। याची ने कहा कि वह चिल्ड्रंस होम में अपनी पत्नी और दो बेटियों के साथ रहता था और इन दो लड़कियों के सिवाय किसी ने कभी उसके खिलाफ कोई शिकायत नहीं दी।

याची ने आरोप लगाते हुए कहा कि उस पर आरोप लगाने वाली लड़की को बॉयफ्रेंड से मिलने से रोकने पर उसने उसके खिलाफ शिकायत दी। हाईकोर्ट ने मनीष की अपील पर अब अपना फैसला सुनाते हुए कहा कि एक छोटी बच्ची अंत तक अपने बयानों पर कायम रही है। ऐसे में उसकी आयु कम होने के चलते उसके बयान पर संदेह करना ठीक नहीं है। हालांकि कोर्ट ने कहा कि याची की दो लड़कियां हैं और वह घर में अकेला कमाने वाला है। साथ ही इतने लंबे समय से जेल में है इसलिए उसकी सजा का एक साल कम कर दिया।
विज्ञापन
विज्ञापन
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें