20 साल बाद सहानुभूति के आधार पर नौकरी बहाल करने को लेकर दाखिल एक याचिका को खारिज करते हुए चीफ जस्टिस ने कहा कि हम जज हैं बादशाह अकबर नहीं जो सहानुभूति की अपील पर जो मांगो दे दें। चीफ जस्टिस ने कहा कि अगर हम बादशाह अकबर होते तो आपके क्लाइंट के नाम चंडीगढ़ का पट्टा लिखवा देते, लेकिन हम जज हैं और अदालत कानून से चलती है, सहानुभूति से नहीं।
सीआरपीएफ के बर्खास्त जवान सोनीपत निवासी बलजीत सिंह ने पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट में याचिका दाखिल करते हुए बताया कि 3 मई 1995 से 17 अगस्त 1995 और 22 जनवरी 1996 से 3 मार्च 1996 के बीच स्वास्थ्य कारणों से वह ड्यूटी पर मौजूद नहीं था। इस बात को नजर अंदाज करते हुए सीआरपीएफ ने उसे बर्खास्त कर दिया।
इसके बाद 2017 मे उसने बर्खास्तगी के आदेश को रद्द करने की मांग की थी। इस मांग को पूरा न करने पर उसने सिंगल बेंच के सामने याचिका दाखिल की, जिसे खारिज कर दिया गया। बलजीत ने हाईकोर्ट की खंडपीठ के समक्ष याचिका दाखिल करते हुए बर्खास्तगी के आदेश को रद्द करने की अपील की।
यहां सुनवाई करते हुए पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस कृष्ण मुरारी और जस्टिस अरुण पल्ली की खंडपीठ ने याची को फटकार लगाई। साथ ही टिप्पणी की कि यह कोर्ट है कोई दरबार नहीं, जहां जो चाहो, जब चाहो और जैसे चाहो मिल जाए। कानूनी अधिकारों का इस्तेमाल समय से किया जाता है, जबकि इस मामले में 20 साल तक याची ने कुछ नहीं किया और एक दिन अचानक नींद टूटी तो याचिकाएं याद आ गईं।
इस पर वकील ने कहा कि याची की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है। इसलिए उससे सहानुभूति दिखाते हुए उसकी नौकरी को बहाल किया जाए। हाईकोर्ट ने कहा कि यह कोर्ट है और कानूनी अधिकारों के चलते ही आदेश जारी किए जाते हैं। हम कोई बादशाह अकबर नहीं हैं जो कोई भी आदेश जारी कर दें। हां, अगर हम होते तो शायद इस शहर का पट्टा आपके क्लाइंट के नाम कर देते।
याची ने कहा कि उसने सीआरपीएफ में रहते हुए देश की सेवा की है। इस पर हाईकोर्ट ने कहा कि हम आप पर 1 लाख रुपये का जुर्माना लगाते हैं और इसे आर्मी वेल्फेयर फंड में भेज देते हैं तो देश की और सेवा हो जाएगी। हाईकोर्ट की इन टिप्पणियों के बीच याची ने हाईकोर्ट से याचिका वापस लेने की छूट मांगी, जिसे मंजूर करते हुए हाईकोर्ट ने याचिका को खारिज कर दिया।