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न्यायिक अधिकारियों के लिए अदालत और आवास के लिए अनावश्यक शर्तें हटाए पंजाब सरकार : हाईकोर्ट

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अमर उजाला ब्यूरो
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चंडीगढ़। हरियाणा और पजाब में जजों के लिए अदालतों व आवास की कमी को लेकर दाखिल जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान पंजाब सरकार ने बताया कि मलेरकोटला में जिला एवं सेशन जज के लिए आवास नहीं मिल पा रहा है। डीसी पीएडब्ल्यूडी के 4 कमरे वाले गेस्ट हाउस में रहने को मजबूर हैं। कोर्ट ने तंज कसते हुए कहा कि क्यों न इसी में चार अदालतों का इंतजाम कर दिया जाए।
सुनवाई के दौरान हरियाणा सरकार ने कहा कि ज्यादातर जिलों में आवास व अदालतों को लेकर स्थिति बेहतर है लेकिन कुछ जिलों में आवास की तो कुछ में अदालतों की कमी है जिसे दूर करने का प्रयास किया जा रहा है। कोर्ट ने कहा कि अब पंजाब बेहतर काम कर रहा है, मोहाली में पंजाब ने हमें 45 फ्लैट दिए हैं आप क्यों नहीं इस प्रकार की पहल करते हैं। हरियाणा सरकार ने कहा कि नीति के अभाव में हाईकोर्ट के स्थान पर जिला एवं सत्र न्यायाधीशों को कब्जा दिया जाता है। कोर्ट ने पंचकूला, गुरुग्राम व सोनीपत में आवास व्यवस्था पर जवाब मांगा तो सरकार ने बताया कि सोनीपत में डीसी ने मिनी सेक्रेटिएट में अस्थाई आवास के लिए लिखा है। कोर्ट ने कहा कि केवल 10 आवास क्यों, जजों के लिए 40 से अधिक आवास की व्यवस्था होनी चाहिए। इसके जरिए दूर-दराज के क्षेत्रों में सेवा देने वाले जजों के बच्चों को भी अच्छी शिक्षा सुविधाएं मिल सकेंगी। हाईकोर्ट ने चेतावनी भरे स्वर में कहा कि प्रदेश भर में जजों के लिए अच्छे आवास व अदालतों को लेकर मुख्य सचिव जानकारी दें अन्यथा प्रशासनिक अधिकारियों के आवास व कार्यालयों की पहचान कर इन्हें न्यायिक अधिकारियों को दे दिया जाएगा।
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इस दौरान हाईकोर्ट ने पंजाब सरकार से मलेरकोटला को लेकर जवाब मांगा तो पंजाब सरकार ने बताया कि अभी मलेरकोटला में एक एडिशनल सेशन जज सात मजिस्ट्रेट तैनात हैं। वर्तमान में उनके पास चार कार्यलय मौजूद हैं और तीन की कमी है। कोर्ट के पिछली सुनवाई पर जारी आदेश के अनुसार पंजाब सरकार ने प्रशासनिक अधिकारियों को दिए गए सरकारी आवासों की फोटो पेश की। पीएडल्यूडी के गेस्ट हाउस के बारे में बताया गया कि इसे डीसी को अलॉट किया गया है। कोर्ट को बताया गया कि सरकार ने दो स्थाई कोर्ट के लिए मंजूरी दी है। हाईकोर्ट के वकील ने बताया कि मंजूरी आदेश में कहा गया है कि यदि बजट होगा तो ही काम आरंभ होगा। दूसरी शर्त यह है कि तय सीमा में कार्य पूरा न होने की स्थिति में नए सिरे से मंजूरी लेनी होगी। कोर्ट ने कहा किकि प्रशासनिक अधिकारियों के लिए सरकार व्यवस्था कर लेती है लेकिन जब न्यायिक अधिकारियों की बारी आती है तो शर्ते लगाकर पीछे हट जाती है।
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