पंजाब में नशे के खिलाफ शुरू हुए अभियान के तहत मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने मंत्रियों-संतरियों के डोप टेस्ट का जो एलान किया गया था, वह अधूरा रह गया है। मंत्रियों-विधायकों की उदासीनता और सरकारी कर्मचारियों के विरोध के कारण अधर में ही रह गया है। पंजाब के एक कैबिनेट मंत्री तृप्त राजिंदर सिंह बाजवा, कुछ आम आदमी पार्टी के विधायकों को छोड़ अन्य कोई भी विधायक या मंत्री डोप टेस्ट कराने नहीं पहुंचा। करीब तीन हफ्ते बीत जाने के बाद भी खुद मुख्यमंत्री ने अपना डोप टेस्ट नहीं करवाया है।
तृप्त राजिंदर सिंह बाजवा डोप टेस्ट कराने मोहाली के सिविल अस्पताल गए लेकिन एक बीमारी के कारण वे जो दवाएं ले रहे हैं, उसे देखते हुए डाक्टरों ने उनका डोप टेस्ट करने से इंकार कर दिया। इसी तरह कुछ मंत्रियों-विधायकों ने बीमारी के कारण अलग-अलग दवाएं सेवन का हवाला देते हुए डोप टेस्ट कराने से इंकार कर दिया। अकाली दल के प्रधान सुखबीर सिंह बादल ने तो डोप टेस्ट के अभियान को ही गलत ठहराते हुए इसे नशे के खिलाफ अभियान से ध्यान मोड़ने वाला करार दिया। लेकिन आप की ओर से सुखपाल सिंह खैरा, कंवर संधू, अमन अरोड़ा समेत कई विधायकों ने डोप टेस्ट कराए।
इस संबंध में सत्ता पक्ष के कुछ विधायकों से जानना चाहा तो वे इस मुद्दे पर बोलने से कतराते रहे जबकि कुछ इसे टाल गए। अकाली दल के नेता अपने पहले बयान पर कायम दिखे, जिसमें उनका कहना था कि सभी अकाली नेता अमृतधारी हैं। उनका नशे से कोई वास्ता नहीं है। दूसरी ओर, डोप टेस्ट को सरकारी पुरुष व महिला दोनों कर्मचारियों के लिए भी अनिवार्य किया गया है, जिसे लेकर विभिन्न कर्मचारी विरोध में खड़े हो गए हैं।
हालांकि मुख्यमंत्री ने यह स्पष्ट किया है कि पाजिटिव पाए जाने वाले किसी भी कर्मचारी को नौकरी से हटाया नहीं जाएगा, बल्कि सरकार अपने खर्च में उनका इलाज कराएगी। लेकिन इस मामले को लेकर पेच अभी फंसा हुआ है। महिला कर्मचारियों के डोप टेस्ट कराने को लेकर अलग से विवाद खड़ा हो गया है। फिलहाल मुख्यमंत्री के आदेशानुसार मुख्य सचिव कर्मचारियों के डोप टेस्ट को लेकर नियमावली तैयार कर रहे हैं, जिसके बाद डोप टेस्ट पर फिर से विवाद छिड़ सकता है।