पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने रक्षा सेनाओं के राजनीतिकरण के प्रयासों पर दुख जाहिर करते हुए कहा है कि सशस्त्र सेना सिर्फ रेजिमेंटल मुखिया के प्रति जवाबदेह होती है न कि उसे नेताओं के इशारों पर काम करना होता है। मुख्यमंत्री ने रक्षा सेनाओं के कामकाज में सियासी दखलंदाजी की मौजूदा प्रथा का तत्काल अंत करने का आह्वान किया ताकि सेना के अफसर और सैनिक अपनी ड्यूटी कुशलतापूर्वक निभा सकें।
मुख्यमंत्री ने कहा कि यह कदम देश की सुरक्षा, एकता और अखंडता के बड़े हितों के लिए ज्यादा अपेक्षित है। यह विचार बुधवार को कैप्टन अमरिंदर सिंह ने पहले विश्व युद्ध के दौरान प्राण न्योछावर करने वाले राष्ट्रमंडल देशों के सशस्त्र सैनिकों को श्रद्धांजलि देते हुए रखे। इस मौके पर शहीदों की याद में दो मिनट का मौन भी रखा गया। कैप्टन ने दुख जताया कि स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक सिद्धांतों की रक्षा के लिए इन महान सैनिकों की बेमिसाल बहादुरी और अमिट जज्बे को उस हद तक मान्यता नहीं मिल सकी।
उन्होंने कहा कि इस ऐतिहासिक युद्ध में लगभग 74000 सैनिक शहीद और 67000 जख्मी हुए। मुख्यमंत्री ने कहा कि पहले विश्व युद्ध में हिस्सा लेने वाले बहादुर सैनिकों की महान बलिदानों को आम तौर पर भुला दिया गया। कैप्टन ने स्कूली पाठ्यक्रम में पहले और दूसरे विश्व युद्ध में भारत के योगदान संबंधी विस्तृत अध्याय शामिल करने की वकालत की है।
अपनी पुस्तक ऑनर एंड फिडेलटी -इंडियनज़ मिलिट्री कंट्रीब्यूशन टू दा ग्रेट वॉर 1914-18 का जिक्र करते हुए मुख्यमंत्री ने बताया कि युद्ध शुरू होने के बाद 20 दिनों के अंदर बुलाए गए भारतीय सैनिकों ने युद्ध में ब्रिटिश को बड़ी सहायता प्रदान की।
इससे पहले चंडीगढ़ में ब्रिटिश हाई कमिश्नर एंडरियू आइर ने विश्व युद्ध में भारत सेना द्वारा निभाई गई भूमिका की सराहना की। उन्होंने कहा कि विश्व की स्वतंत्रता और मुक्ति के लिए इस युद्ध में भारतीय सेना की वचनबद्धता, संजीदगी और समर्पण की झलक मिलती है।