पंजाब की जनता कई समस्याओं से त्रस्त थी। युवा पीढ़ी नशे से बर्बाद हो रही थी। शिअद-भाजपा सरकार इसे नकार रही थी। कीटनाशक घोटाले से बर्बाद हुए किसान जान दे रहे थे। सरकार तरक्की के गीत गा रही थी। सड़कों पर गैंगेस्टर बेखौफ थे, अतिसुरक्षित जेलों से कैदी भाग रहे थे। सरकार लीपापोती में जुटी थी। लुधियाना, जालंधर, अमृतसर और मंडी गोविंदगढ़ का उद्योग डूब रहा था और राजनेता अपना धंधा चमका रहे थे।
इन सब बातों ने पिछले पांच साल में बादल सरकार को इतना अलोकप्रिय बना दिया कि देश में चल रही मोदी लहर भी उसकी नाव पार नहीं लगा सकी। शिअद के लिए संतोष की बात है कि मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल, डिप्टी सीएम सुखबीर बादल और बिक्रमजीत सिंह मजीठिया अपनी सीट बचा ले गए। 23 सीटों पर चुनाव लड़ रही भाजपा खुद प्रदेश में 20 सीटों पर हार गई। मोदी, अमित शाह और अरुण जेटली की सभाएं और रेलियां भी सत्तारूढ़ गठबंधन के लिए कुछ खास न कर सकीं।
सिद्धू की सुनामी ने निकाली शिअद की हवा
इस जीत से वर्ष 2012 में सत्ता से चूके कैप्टन अमरिंदर सिंह के चेहरे की चमक बढ़ गई है। उनके नेतृत्व में कांग्रेस ने माझा और दोआबा में भाजपा से उसके गढ़ छीन लिए। मालवा में पिछली बार की तरह ही कांग्रेस ने अपना दबदबा कायम रखा। पार्टी ने पांच साल में अपनी शक्ति कई तरह से बढ़ाई। पिछले चुनाव में जहां मनप्रीत बादल कांग्रेस के वोट काट रहे थे, वहीं इस बार साथ हैं। भाजपा को छोड़ कर कांग्रेस में आए नवजोत सिंह सिद्धू अपने साथ जो बयार लेकर आए उसने माझा और दोआबा में कांग्रेस की हवा को भाजपा-शिअद के लिए भयावह सुनामी बना दिया।