Punjab And Haryana Highcourt Chandigarh
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चंडीगढ़ नगर निगम में मनोनीत पार्षदों के मताधिकार को चुनौती देने वाली याचिका पर हाईकोर्ट ने पूछा कि नामित पार्षदों मताधिकार का इतना शौक है तो चुनाव लड़ कर क्यों नहीं आते।
जस्टिस एसएस सारों एवं जस्टिस अवनीश झिंगन की खंडपीठ ने वीरवार को नामित पार्षदों के सामने सवाल उठाया। नॉमिनेटेड पार्षदों के साथ ही निगम और प्रशासन ने याचिका की मेनटेनेबिलिटी पर ही सवाल उठाते हुए कहा कि इस तरह की जनहित याचिका दायर कर विधान को नहीं बदला जा सकता।
इसका विरोध करते हुए याचिकाकर्ता एडवोकेट अरोड़ा ने कहा कि ऐसे कई उदहारण हैं जहां जनहित याचिका पर कानून को बदला गया है। प्रशासन ने कहा कि याचिकाकर्ता सतिंदर सिंह पहले खुद पार्षद रह चुके हैं। वह अब चुनाव हर चुके हैं ऐसे में यह याचिका ही आधारहीन है।
प्रशासन की ओर से सीनियर स्टैंडिंग काउंसल सुवीर सहगल ने इलाहबाद हाई कोर्ट के एक फैसले का हवाला देते हुए कहा कि, इस फैसले में नॉमिनेटेड पार्षदों को मेयर के चुनाव में वोट देने का अधिकार दिया गया है, लेकिन निगम की अन्य बैठकों में उन्हें मत देने के अधिकार नहीं है।
उनके तर्क का विरोध करते हुए अरोड़ा ने कहा कि मेयर हो या डिप्टी मेयर, उनका चुनाव भी निगम की बैठक में ही होता है। ऐस में अन्य बैठकों को अलग करके नहीं देखा जा सकता। काफी लंबे समय तक चली बहस के बाद हाई कोर्ट ने याचिका पर सोमवार को भी बहस जारी रखने के आदेश देते हुए सुनवाई स्थगित कर दी।
गत दिवस भी याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया था कि संजीव वर्मा के मामले में वर्ष 2015 में हाई कोर्ट की पांच जजों की फुल बेंच ने यह तय कर दिया था कि, म्युनिसिपल कमेटी या म्यूनिसिपल काउंसिल के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के खिलाफ लाए गए अविश्वास प्रस्ताव में नॉमिनेटेड सदस्य शामिल नहीं हो सकते हैं। बावजूद इसके चंडीगढ़ नगर निगम में नॉमिनेटेड पार्षदों को वोट देने का अधिकार दिया गया है।