जाट आरक्षण मामले की सुनवाई करने वाली पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट की बेंच ने यादव महासभा की अर्जी पर सुनवाई पूरी कर ली है। यादव महासभा ने बेंच के दोनों जजों के जट सिख होने की बात कहते हुए सुनवाई दूसरी बेंच को रेफर करने की अपील की थी। बुधवार को हरियाणा सरकार, अर्जी दाखिल करने वाले याची तथा जाटों का पक्ष सुने जाने के बाद अब वीरवार को बेंच के केस से पीछे हटने या न हटने पर फैसला होगा।
हरियाणा में जाटों सहित 6 जातियों को आरक्षण के हरियाणा सरकार के निर्णय को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान यादव महासभा ने अर्जी दाखिल कर बेंच के दोनों जजों के जटसिख होने की बात कही थी। सभा ने कहा था कि आरक्षण का लाभ उस जाति को भी दिया जा रहा है, जिससे दोनों जज हैं। ऐसे में मानवीय व्यवहार का हवाला देते हुए कहा गया कि मामले का फैसला प्रभावित हो सकता है।
मामले में बुधवार को सुनवाई आरंभ हुई। इस दौरान हरियाणा सरकार ने अपना पक्ष रखा। सरकार ने कहा कि यादव महासभा ने जनवरी के मध्य में बेंच से इस केस को दूसरी बेंच को रेफर करने की अपील की है। जबकि यही बेंच जुलाई से मामले की सुनवाई कर रही है।
'सरकार की दलील, आज जाति तो कल लिंग के आधार पर उठेगी मांग'
Punjab And Haryana Highcourt Chandigarh
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सरकार की दलील, आज जाति तो कल लिंग के आधार पर उठेगी मांग
वहीं सरकार ने कहा कि जज के तौर पर शपथ लेते हुए किसी भी तरह से प्रभावित न होने की बात कही जाती है। यदि केस से बेंच पीछे हटी तो संविधान के लिए काला दिन होगा। हरियाणा सरकार ने कहा कि अर्जी को खारिज कर यही बेंच इस मामले को आगे सुने।
यदि अर्जी को मंजूरी दी गई तो आज जाति के आधार पर बेंच को पीछे हटने की बात कही जा रही है, कल लिंग के आधार पर और आगे क्षेत्र के आधार पर भी ऐसी मांग उठेंगी। ऐसे में इस अर्जी को खारिज करते हुए आगे इस प्रकार की विषमताओं का मार्ग रोका जाना चाहिए।
याची का तर्क, लोगों के बीच सही संदेश जाए
इसके बाद अर्जी दाखिल करने वाली यादव महासभा के वकील पीआर यादव ने दलीलें आरंभ की। यादव ने कहा कि उनके मन में इस बेंच और न्यायपालिका के लिए पूरा सम्मान है, लेकिन लोगों के मन में बेंच के जजों की जाति को लेकर सवाल है। ऐसे में लोगों के बीच सही संदेश जाए और न्यायपालिका का सम्मान बना रहे, इसलिए बेंच को इस केस की सुनवाई से पीछे हट जाना चाहिए। यह आम मामला नहीं है यहां परिस्थितियां बिलकुल अलग हैं और इन्हें देखते हुए यहां फैसला जरूरी है।
'आज जाट बेंच पर सवाल उठे हैं कल बेंच के नॉन जाट होने पर उठेंगे'
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कुम्हार महासभा ने कहा, जज की कुर्सी संविधान की गरिमा
याचियों में से एक कुम्हार महासभा की ओर से पेश होते हुए सीनियर एडवोकेट वीके जिंदल ने भी अपना समर्थन बेंच को देते हुए कहा कि उन्हें इस मामले की सुनवाई यही बेंच करे तो कोई आपत्ति नहीं है। काला कोट पहनकर कानून की रक्षा के लिए संवैधानिक पद पर बैठे लोगों को जाति, धर्म, क्षेत्र और लिंग के आधार पर नहीं नहीं देखा जा सकता है। जज की कुर्सी संविधान की गरिमा है, बेंच को पीछे नहीं हटना चाहिए।
जाट महासभा ने की अर्जी खारिज करने की मांग
वहीं जाट महासभा व जाटों की ओर से पेश हुए वकील की ओर से दलील देते हुए कहा गया कि बेंच को केस से पीछे हटने के लिए दाखिल की गई अर्जी सीधे तौर पर संविधानिक कार्यालय और पद का अपमान है। ऐसे में याचिका को खारिज करते हुए अर्जी दाखिल करने वाले याची पर भारी जुर्माना लगाया जाए।
आज जाट बेंच पर सवाल उठे हैं कल बेंच के नॉन जाट होने पर उठेंगे
याचिका पर सुनवाई के दौरान हरियाणा सरकार और जाटों की ओर से एक सुर में कहा गया कि जाट होने के चलते यदि बेंच इस केस से पीछे हटती है तो अलग परंपरा शुरू होगी। अभी जाट जज हैं तो अन्य पक्ष ने पीछे हटने की अर्जी डाली है। कल यदि बेंच में नॉन जाट होंगे, तो जाट भी अर्जी दाखिल कर सकते हैं। ऐसे में कोर्ट मामले में अर्जी खारिज कर उदाहरण पेश करें।