रिटायर्ड जस्टिस रंजीत सिंह के वकील ने कहा था सिर्फ आयोग पर नहीं बल्कि एक रिटायर्ड हाईकोर्ट जज की प्रतिष्ठा पर हमला है। जब सुखबीर बादल और बिक्रमजीत सिंह मजीठिया ने टिप्पणियां की थीं तो आयोग प्रभाव में था। शिकायत करते समय आयोग भंग हो चुका था लेकिन एक्ट के प्रावधान के तहत उन्होंने तय समय सीमा के भीतर इसकी शिकायत कर दी थी। ऐसे में शिकायत मान्य है।
सुखबीर बादल और मजीठिया की ओर से दलील दी गई कि बेअदबी मामले की जांच कर चुके जस्टिस रंजीत सिंह आयोग की वैधता 31 अगस्त को खत्म हो चुकी थी। ऐसे में जनवरी माह में आयोग के हिस्से के रूप में कमीशंस ऑफ एन्क्वायरी एक्ट के तहत की गई शिकायत वैध नहीं है। एक अधिकारी के कार्यालय में रहते जो अधिकार होते हैं वह कार्यालय छोड़ने के बाद नहीं रहते। कार्यकाल खत्म होने के बाद कमीशंस ऑफ एन्क्वायरी एक्ट की धारा-10 ए के तहत शिकायत नहीं की जा सकती है।