आत्महत्या के लिए मजबूर करने के मामले में आरोपी महिला की अग्रिम जमानत याचिका खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि मौत भयावह होती है, कोई मरने से पहले यूं ही किसी बेकसूर को जिम्मेदार नहीं ठहराएगा। हाईकोर्ट ने अहम आदेश जारी करते हुए कहा कि आत्महत्या से पहले लिखे गए पत्र की गंभीरता से जांच आवश्यक होती है।
रेवाड़ी निवासी सुधा ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल करते हुए बताया कि जोरावर ने 10 जून 2020 को आत्महत्या कर ली थी। इसके बाद उसका बेटा दीपक पुलिस के पास पहुंचा और मौत से पहले लिखे पत्र के आधार पर पुलिस ने याची व उसके पति यशपाल को आरोपी बनाते हुए एफआईआर दर्ज कर ली थी। याची ने कहा कि उसकी ऐसी कोई भूमिका नहीं थी जिसके चलते जोरावर को आत्महत्या करनी पड़े। उनके बीच केवल पैसे के लेनदेन से जुड़ा कुछ मामला था।
याची पक्ष की दलीलों को सुनने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि मनुष्य के लिए जीवन बहुत कीमती चीज है। मनुष्य मृत्यु से डरता है और लंबा जीवन जीना चाहता है। वृद्धों में भी अधिक जीने की इच्छा होती है। बहुत ही खराब परिस्थितियों में कोई अपना जीवन समाप्त करने का फैसला लेता है। ऐसा करते समय, यदि आत्महत्या करने वाले व्यक्ति ने किसी अन्य व्यक्ति को इसके लिए मजबूर करने का जिम्मेदार ठहराया है तो उसके इस तरह के बयान को पूरी गंभीरता के साथ लेने की आवश्यकता है। कोर्ट ने कहा कि इस मामले में मृतक ने याची को जिम्मेदार ठहराया है इसलिए उसे अग्रिम जमानत का लाभ नहीं दिया जा सकता।
यह है मामला
मृतक ने कुछ समय पहले याची व उसके पति को मकान बनाने के लिए 11 लाख रुपये दिए थे। इस राशि को वापस मांगा गया तो टाल मटोल शुरू हुई। याची ने इसके बारे में पुलिस को शिकायत दी थी। इसके बाद उस पर समझौता करने का दबाव बनाने की कोशिश की गई। मरने से पहले लिखे पत्र में जोरावर ने कहा था कि कुछ दिन पहले याची से जब उसने पैसे मांगे तो उसने गिरेबान पकड़कर जान से मरवाने की धमकी थी दी थी। इससे आहत होकर वह जान देने जा रहा है।