मां द्वारा अपनी बच्ची को पाने के लिए दाखिल याचिका को मंजूर करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि मां की ममता का कोई न तो विकल्प है और न ही कोई मोल। बच्ची के लिए मां की गोद प्राकृतिक पालना होती है इसलिए बच्ची को उसे सौंपा जाना चाहिए। बठिंडा के एक दंपती के बीच वैवाहिक विवाद चल रहा था और बच्ची पिता की निगरानी में थी।
मां ने याचिका दाखिल करते हुए बच्ची को पिता के पास से लेकर उसे सौंपने की अपील की थी। बेंच ने कहा कि पिता की निगरानी को गैरकानूनी नहीं कहा जा सकता है लेकिन नाबालिग बेटी की उम्र पांच साल से कम होने के कारण उसे मां के पास रहने का अधिकार है। कोर्ट ने यह भी आदेश दिया कि पिता सप्ताह में एक बार बेटी से मिल सकता है।
इसके साथ ही सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि मां के प्यार और उसके द्वारा की गई देखभाल का कोई मूल्य नहीं है। ऐसे में मां का स्थान कोई नहीं ले सकता। पैसे से ली गई सुविधा मां के प्यार और देखभाल की जगह नहीं ले सकती। बेंच ने कहा कि वर्तमान मामले में नाबालिग बेटी के कल्याण और हित के सवाल पर मां के सहज निस्वार्थ प्रेम को अनदेखा नहीं किया जा सकता।
बेंच ने कहा कि मां की गोद एक प्राकृतिक पालना है। बच्ची के लिए मां का संरक्षण जरूरी है और कोई अन्य इसके बराबर नहीं है। बच्चों की स्वास्थ्य की वृद्धि के लिए मातृ देखभाल और स्नेह जरूरी है।