पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने कहा है कि धन शोधन रोकथाम अधिनियम (पीएमएलए), 2002 के तहत ऐसी संपत्ति को कुर्क नहीं किया जा सकता जिसे इस अपराध के करने से पहले हासिल की गई हो।
जस्टिस जसवंत सिंह और संत प्रकाश की पीठ ने कहा कि प्रवर्तन निदेशालय के निदेशक या उसके द्वारा अधिकृत कोई अन्य अधिकारी को इस बात का विशेष जिक्र करना जरूरी है कि इसका कारण क्या है कि संपत्ति को कुर्क किया जा रहा है।
वर्तमान मामले में मैसर्स जलधारा एक्सपोर्ट्स के खिलाफ वैट रिफंड में फरवरी-मार्च 2013 के दौरान धोखाधड़ी के आरोप में आईपीसी की धारा 177, 420, 465, 467, 468, 471 के तहत मामला दर्ज किया। इसके बाद रेजिडेंशियल फ्लैट को कुर्क कर दिया।
इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि अपराध से आए धन से ये संपत्तियां खरीदी गईं। अदालत ने कहा कि पीएमएलए की धारा 24 के अनुसार, इस संपत्ति का धनशोधन से संबंध नहीं है यह साबित करने की जिम्मेदारी उस व्यक्ति की है, जिसकी संपत्ति को कुर्क किया गया है।
अदालत ने कहा कि वर्तमान मामले में यह स्वीकार किया गया है कि संपत्ति को 1991 में खरीदा गया और 2009 में इसे एक बैंक के पास गिरवी रख दिया गया। इसमें कहा गया कि कथित अपराध 2013 में हुआ, जबकि कुर्की का आदेश दिसंबर 2017 में दिया गया।
इस बात का कोई सबूत नहीं है कि अपीलकर्ताओं ने 2009 या 2013 के बाद इस कथित संपत्ति को बेचने की कोशिश की, जिस वजह से प्रतिवादी को कुर्की का आदेश देना पड़ा। प्रतिवादी को उसके पास जो सबूत था, उसके आधार पर यह बताना जरूरी था कि इस कथित संपत्ति को किसी तरीकेसे छिपाए जाने या कहीं और स्थानांतरित कर दिए जाने की आशंका है।