हर चुनाव से पहले चंडीगढ़ में लाल डोरा का जिन्न बाहर आ जाता है। भाजपा ने 2014 के लोकसभा चुनाव में वादा किया कि जीतने के बाद वह लाल डोरा को बढ़ाएंगे। अब 2023 भी आधा बीत गया है लेकिन लाल डोरा बढ़ाना या समाप्त करना तो दूर कई गांवों में लाल डोरा के बाहर रहने वाले लोग अभी तक पानी के कनेक्शन के लिए तरस रहे हैं। अब आगामी लोकसभा चुनाव को देखते हुए एक बार फिर लाल डोरा बढ़ाने के वादे और दावे होने लगे हैं।
राजनीतिक गलियारों में भले 2014 से ही लाल डोरा बढ़ रहा हो, लेकिन प्रशासन के कई पूर्व व वर्तमान अधिकारियों से बात करने पर पता चला है कि प्रशासनिक स्तर पर कभी लाल डोरा बढ़ाने को लेकर फाइल नहीं चली। यह वादे और दावे हवा-हवाई ही हैं। हालांकि जनवरी 2021 में तत्कालीन प्रशासक वीपी सिंह बदनौर ने प्रशासन के अधिकारियों के साथ एक बैठक की थी।
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बैठक में प्रशासक ने कहा था कि लाल डोरा क्षेत्र के बाहर बहुत सारे निर्माण और विकास कार्य हुए हैं, इसलिए प्रशासन को इन विकास को नियमित करने के लिए एक योजना तैयार करनी चाहिए। चर्चा हुई और बेंगलुरु स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ ह्यूमन सेटलमेंट (आईआईएचएस) के साथ समझौता किया गया, लेकिन कुछ महीनों बाद यह भी स्पष्ट हो गया कि ये एजेंसी भी मास्टर प्लान-2031 के तहत लाल डोरे के अंदर के इलाके को ही विकसित करने की योजना पर काम कर रही थी। इसे लैंड पूलिंग योजना भी कही गई और दड़वा गांव के लाल डोरे के अंदर के इलाकों को पायलट प्रोजेक्ट के तहत चुना गया लेकिन अब वो योजना भी कागजों में ही रह गई है।
हालांकि बीते दिनों 18 अगस्त को भाजपा की तरफ से जारी एक प्रेस विज्ञप्ति ने फिर लाल डोरा की हलचल बढ़ा दी, जिसमें लिखा गया था कि ‘लाल डोर के बाहर बनी सभी इमारतें होगी नियमित’। उधर, नाम न छापने की शर्त पर प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि लाल डोरा के बाहर के घरों को पानी का कनेक्शन देने को लेकर फैसला लिया गया है लेकिन मकानों को नियमित करने की कोई योजना नहीं है।
लाल डोरा बढ़ाना या समाप्त करना दूर, पानी का कनेक्शन तक नहीं दिला पाए
लाल डोरे के बाहर के मकानों को बिजली के कनेक्शन मिले हुए हैं, लेकिन पानी का कनेक्शन नहीं है। फैदां समेत विभिन्न कॉलोनियों में लोग पानी के टैंकरों पर ही निर्भर हैं। वर्ष 2021 में नगर निगम की सदन की बैठक में लाल डोरे के बाहर के घरों को पानी का कनेक्शन देने का प्रस्ताव भी पास हो गया था लेकिन प्रशासन ने मंजूरी नहीं दी। कई गांव के लोग कनेक्शन के लिए वर्षों से परेशान हैं। हाल ही में हुई प्रशासकीय सलाहकार परिषद की बैठक में भी मुद्दा उठा। फैसला भी हो गया लेकिन अब तक जनता के हाथ खाली है।
चर्चा मात्र से बढ़ गए अवैध निर्माण... अब यह हैं हालात
जब से शहर में लाल डोरे के बाहर के निर्माण को नियमित करने की बातें शुरू हुई हैं, उसके बाद से लाल डोरे के बाहर निर्माण काफी बढ़ गया है। अब कई गांवों में जितनी आबादी लाल डोरे के अंदर है, उससे कहीं ज्यादा बाहर रह रही है।
1. दड़वा में पिछले पांच वर्षों में अंदर की तरफ बहुत अवैध निर्माण हुआ है। पूरी की पूरी कॉलोनी बस गई है।
2. किशनगढ़ के कई खेत पिछले पांच साल में खत्म हो गए हैं। अब वहां घर या दुकानें खुल गई हैं।
3. खुड्डा अलीशेर के कई हिस्से इको सेंसिटिव जोन में आते हैं, जबकि वहां तेजी से निर्माण हुआ है।
4. कोविड के दौरान भू माफियाओं ने कई इलाकों में लाल डोरे के बाहर प्लॉट काटकर बेच दिए और अब वहां घर भी बन गए हैं।
लाल डोरे के बाहर करीब 254 एकड़ पर हैं निर्माण
लाल डोरा गांव में एक एक्सटेंशन है, जिसे गांववासी गैर कृषि उद्देश्य के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं। इस जमीन पर वे मवेशी आदि रख सकते हैं। भू-राजस्व विभाग ने इस एरिया को लाल डोरे के नाम से मार्क किया है। इसके बाहर कृषि भूमि पर किसी भी तरह का निर्माण अवैध माना जाता है लेकिन प्रशासन के एक सर्वे के अनुसार शहर के गांवों में लाल डोरे के बाहर करीब 254 एकड़ एरिया में लोगों ने अवैध निर्माण कर रखा है, जिसमें तीन हजार से ज्यादा घर शामिल हैं।
मेरे कार्यकाल के दौरान कभी लाल डोरा बढ़ाने की फाइल नहीं आई। हालांकि गांव की लाल डोरे के अंदर की अनियोजित आबादी को एजेंसी की मदद से योजनाबद्ध तरीके से विकसित करने की कोशिश की थी, लेकिन इसकी प्रक्रिया काफी जटिल थी। लोग जमीनें देने को तैयार नहीं थे। इसलिए वह परियोजना भी अटक गई थी।
- मनोज परिदा, पूर्व सलाहकार, यूटी प्रशासक