शहीदों के नाम पर सरकारें राजनीति ही करती हैं। फोटो खिंचवाने एवं वोट बैंक जुटाने के बाद शहीदों के परिवारों को नजरंदाज कर दिया जाता है। सिर्फ आजादी दिवस या गणतंत्रता दिवस समारोह के वक्त ही शहीदों के परिवारों को सम्मान देने के लिए याद किया जाता है, जबकि वास्तविकता यह है कि वहां जाकर शहीदों के परिवार अपमानित ही होते हैं। जिसके चलते बहुत से परिवारों ने ऐसे समारोहों में शिरकत करना ही बंद कर दिया है।
कारगिल युद्ध के दौरान शहीद हुए कर्मजीत सिंह नाईवाला फौज की 101 इंजीनियर रेजीमेंट में बतौर नायक तैनात थे। सेना में करीब 25 साल की उम्र में उनकी भर्ती हुई थी। 11 वर्ष की सेवा करने के बाद कारगिल युद्ध में उनकी ड्यूटी विजय उपरक्षक ऑपरेशन में लगी। जहां 26 दिसंबर 1999 को उन्हें शहादत प्राप्त हुई।
शहीद की पत्नी स्वर्णजीत कौर और माता रणजीत कौर गृहिणी हैं। पिता दसौंधा सिंह सब्जी विक्रेता हैं। दो बेटे गुरप्रीत सिंह और प्रगट सिंह बारहवीं के बाद आगे पढ़ाई की तैयारी कर रहे हैं। शहीद का भाई जीवन सिंह प्रापर्टी का कारोबार करने लगा है, दूसरा भाई बलवीर सिंह शहीद के नाम केंद्र की ओर से अलॉट हुई गैस एजेंसी चला रहा है।
वादा करके वी पंजाब सरकार ने कुझ नहीं दित्ता
शहीद कर्मजीत सिंह नाईवाला के परिजनों का कहना है कि भारतीय फौज और केंद्र सरकार की ओर से उन्हें योग्य सहायता मिली है। जबकि पंजाब में सरकारें शहीदों के नाम पर रानीति कर रही हैं। तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने 1999 के दौरान उनसे अनेक वादे किए। इसमें जमीन दिलाने, रिहायश के लिए अच्छे शहर में प्लाट, 10 लाख नकद और बच्चों को सरकारी नौकरी देना शामिल था।
उन वादों की फाइलें कहां दबा दी गई हैं, इस बारे में परिवार को कुछ नहीं बताया जा रहा। राज्य सरकार की ओर से शहीद के नाम पर कोई यादगार तक तैयार नहीं की जा सकी है। गांव में बनाया गया प्रवेश द्वार शहीद परिवार ने केंद्र से मिले पैसे से बनवाया। इसके बावजूद शहीद की पत्नी स्वर्णजीत कौर अपने दोनों बेटों गुरप्रीत सिंह और प्रगट सिंह को फौज में भेजना चाहती हैं।