पीजीआई डायरेक्टर प्रोफेसर वाइके चावला वीरवार को रिटायर हो गए। पांच साल के कार्यकाल के दौरान पीजीआई की कई उपलब्धियां रही हैं तो कई विवाद भी उनके साथ जुड़े रहे। रिटायरमेंट के मौके पर प्रोफेसर चावला ने उन सभी मुद्दों पर चुप्पी तोड़ी, जिन पर कुछ विवाद उठे थे। उन्होंने सभी सवालों का जवाब बहुत ही तसल्ली और बेबाकी से दिए। उन्होंने बताया कि वे अपने कार्यकाल से पूरी तरह से संतुष्ट हैं। पेश हैं उनसे बातचीत से जुड़े कुछ सवाल-जवाब।
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सवाल : डायरेक्टर के पद पर कैसा अनुभव रहा?
जवाब : बहुत अच्छा रहा, क्योंकि हर दिन नई चुनौती से जूझना पड़ता था। दरअसल पीजीआई में बहुत बड़ा स्टाफ है। मरीजों की भारी भीड़ है। जब इतनी संख्या में लोग हों तो कुछ न कुछ मुद्दे जरूर उठते हैं। इन्हें प्रशासनिक मशीनरी और उन लोगों की मदद से आसानी से निपटा जा सकता है, जो आपके समर्थन में हों। अपने प्रोफेशनल कार्य (हेप्टोलॉजी प्रैक्टिस के संबंध में) के साथ कुछ समझौता जरूर किया, लेकिन मैं अपने कार्यकाल से संतुष्ट हूं।
सवाल : एडमिनिस्ट्रेटर बनना कितना मुश्किल है एक शिक्षक बैकग्राउंड से आए व्यक्ति को?
जवाब : थोड़ा मुश्किल है। जब आप कुर्सी पर बैठते हैं तो कई सारे ऐसे मुद्दे आपके सामने आते हैं, जिनसे आपका कभी वस्ता नहीं पड़ा होगा। जब मेरी नियुक्ति हुई थी, तब मेरे मन में विचार आया था कि पीजीआई को सभी एचओडी और डायरेक्टर के लिए शार्ट टर्म मैनेजमेंट कोर्स का प्रावधान करना चाहिए। हमने इस बारे में कई मैनेजमेंट संस्थानों से जुड़ने की कोशिश की, लेकिन वह इतना महंगा था कि वह बात सिरे नहीं चढ़ सकी। एक व्यक्ति की ट्रेनिंग पर करीब 75 हजार से लेकर एक लाख रुपये का खर्च आने वाला था। मैंने अपने इस विचार के बारे में स्वास्थ्य विभाग को भी अवगत कराया था, वे भी राजी थे।
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सवाल : अच्छे और कड़वे अनुभव क्या रहे?
डायरेक्टर पद से प्रो. चावला आज होंगे रिटायर
- फोटो : अमर उजाला
जवाब : सबसे अच्छा अनुभव समर्थन और मदद का रहा है, जो मुझे अपने साथियों से हमेशा मिलता रहा है। पदमश्री मिलना, पीजीआई को देश का सबसे साफ-सुथरे हास्पिटल का अवार्ड मिलना मेरे के लिए काफी महत्वपूर्ण है। अवार्ड समारोह के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बार-बार कहा कि देश के दूसरे अस्पतालों को पीजीआई का अनुसरण करना चाहिए। मेरे हिसाब से कड़वा अनुभव वह रहा, जब लोग उन डिमांड को लेकर आते थे, जो मेरे कंट्रोल में नहीं होते थे।
सवाल : पीजीआई की सबसे बड़ी समस्याएं क्या हैं?
जवाब : मरीजों की भीड़। हमने काफी कोशिश की, लेकिन पीजीआई की ब्रांड वैल्यू की वजह से भीड़ में कोई कमी नहीं आई। आसपास के मेडिकल कालेज और हास्पिटल को पीजीआई के कुछ बोझ लेना चाहिए। दूसरी समस्या स्टाफ व डाक्टरों के मकानों की रही। इसके लिए ग्रांट की जरूरत है, जिसका मिलना काफी मुश्किल है। सभी स्टाफ व डाक्टर के घर के निर्माण के लिए कम से कम 1500 करोड़ रुपये की जरूरत है।
सवाल : क्या भीड़ से पीजीआई का रिसर्च वर्क प्रभावित होता है?
जवाब : बिल्कुल। सुबह आठ बजे से लेकर शाम सात बजे तक काम करने के बाद रिसर्च वर्क कैसे हो सकता है। रिसर्च के लिए समय चाहिए। इसके बावजूद मुझे पीजीआई पर गर्व है कि रिसर्च पर पीजीआई का विश्व में पांचवां स्थान है। एम्स का तीसरा। एम्स के पास 800 फैकल्टी मेंबर है, जबकि पीजीआई के पास 400। हमारे डाक्टर, रेजिडेंट नर्सिंग व टेक्नीशियन बहुत ही उम्दा हैं।
लोग कहते हैं कि आप अच्छे इंसान है
प्रोफेसर योगेश कुमार चावला
- फोटो : File Photo
सवाल : लोग कहते हैं कि आप अच्छे इंसान है, लेकिन एक कमजोर एडमिनिस्ट्रेटर हैं
जवाब : वे क्या कहते हैं, मैं उसे बदल नहीं सकता। मैं अपने कार्यकाल से पूरी तरह से संतुष्ट हूं। वो है ना गाना, कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना। मैं अपनी टिप्पणी बंदगी फिल्म के उस गाने के साथ खत्म करना चाहूंगा, गुण तो था नहीं, अवगुण भुला देना।
(इतना कहना के बाद प्रोफेसर चावला थोड़े भावुक हो गए) एक निर्देशक के तौर पर मैंने बहुत कुछ खोया है। मैंने अपनी फैमिली के साथ समझौता किया। अपने प्रोफेशनल के साथ समझौता किया। डायरेक्टर बनने के बाद मैं उन्हें बिल्कुल भी समय नहीं दे पाया, जबकि इसमें उनका कोई दोष नहीं था और मैं इसके लिए किसी को दोषी भी नहीं ठहराता। यह बहुत ही व्यस्त स्थान है। एम्स और पीजीआई की वर्किंग में बहुत अंतर है। एम्स में यदि बेड फुल हो गए तो वे लिखकर टांग देते हैं, जबकि यहां ऐसा नहीं है।
सवाल : रिटायरमेंट में 11 महीने हैं, क्या आगे भी इसी पद पर काम करने की इच्छा थी
जवाब : नहीं। एक डायरेक्टर के लिए पांच साल काफी हैं। आईएएस भी एक पोस्ट पर तीन साल से ज्यादा नहीं रहते। बाकी समय मैं अपने डिपार्टमेंट में बिताना चाहता हूं। वहां पर मरीजों को देखने पर आपको अलग ही संतुष्टि मिलती है। वे आपको दुआ देते हैं। यहां तो सिर्फ गालियां मिलती हैं।
सवाल : बच्चों से जुड़े मुद्दों पर क्या कहना चाहेंगे।
डायरेक्टर पद से प्रो. चावला आज होंगे रिटायर
- फोटो : अमर उजाला
जवाब : मेरे ख्याल से वह मुद्दा बेवजह उठाया गया। बच्चों के साक्षात्कार के दौरान मैंने खुद को अलग कर लिया था। मुझे लगता है कि कुछ लोगों को मुझसे या मेरे चेहरे से दिक्कत थी, तभी यह मुद्दा उठा। डायरेक्टर का मतलब यह है कि आपके बच्चे आपके संस्थान में आवेदन नहीं कर सकते हैं। यहां काम नहीं कर सकते। यदि आप डायरेक्टर बनना चाहते हैं तो अपने बच्चों को भूल जाइए। बेहतर होगा कि आप उनसे ये कह दें कि वे यहां से दूर रहें।
सवाल : नए डायरेक्टर के लिए कुछ सुझाव
जवाब : मरीजों की भीड़ से निपटने के लिए कुछ नए आइडिया पर काम करें। पीजीआई के न्यू प्लान न्यूरोसाइंस सेंटर, स्क्रीनिंग ओपीडी, नेशनल ट्रांसप्लांट सेंटर व क्रोनिक रिहैबिलिटेशन सेंटर हैं, जो पीजीआई के लिए मील का पत्थर साबित होंगे। सीनियर सिटीजन सेंटर बनाने की योजना है। यदि यह बन जाता है कि देश का पहला सेंटर होगा और इस रीजन के लोगों के लिए एक गिफ्ट भी होगा।