चंडीगढ़ में आइरिश लेडी नोरा रिचर्डसन के जीवन पर आधारित नाटक का मंचन
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मंच रंगमंच अमृतसर व रूपक कला व वेलफेयर सोसाइटी ओर से सेक्टर-18 स्थित टैगोर थिएटर में नौरा नाटक का मंचन किया गया। नाटक का निर्देशन केवल धालीवाल ने किया। इस नाटक को नवनिंद्र बहल ने लिखी है। खास बात यह है कि नोरा की भूमिका भी नवनिंद्र बहल ने निभाई। पहली बार नाटक देखने के लिए एक सौ रुपये का टिकट लगाया गया। बुधवार शाम चार बजे तक चार सौ टिकट बिक गए थे। लोगों ने तालियां बजाकर कलाकारों का उत्साह बढ़ाया।
यह नाटक पंजाबी रंगमंच स्थापित करने वाली आयरिश लेडी नोरा रिचर्ड की जीवन पर है। इस नाटक के माध्यम से नोरा की जिंदगी के बारे में बताया गया। बहुत कम लोग नौरा के योगदान के बारे में जानते है। पंजाब में रंगमंच की स्थापना की थी। नोरा हमेशा कलाकारों का प्रोत्साहित करती थी। भारत-पाकिस्तान के बंटवारे के वक्त उन्होंने दिल्ली के फि रोजशाह कोटला मैदान में कलाकार शरणार्थियों के लिए कैंप भी लगवाए। वह ऐशो आराम छोड़कर भारत में आकर बसी गई।
एक बार नोरा को ब्रिटेन के एक पब्लिक हॉल में नोरा ने ऐसी फिल्म देखी जिसमें भारतीयों को गलत बताया जा रहा था। जिसे देख वह भड़क गई और इसका विरोध भी किया। उस वक्त ब्रिटिश शासक भारतीयों और भारतीयों को साथ देनेवालों के खिलाफ थी। इसलिए नोरा को एक महीने की सजा सुनाई गई। नौरा नीदरलैंड में पली बढ़ी थीं। उन्हें बचपन से ही टॉल्सटाय और गोर्की जैसे लेखकों को पढ़ने लगी। वहीं से एक्टिंग और थियेटर के प्रति दिलचस्पी पैदा हुई।
1910 में उनके पति फिलिप रिचर्ड को लाहौर में दयाल सिंह कॉलेज में अंग्रेजी पढ़ाने के लिए ब्रिटिश सरकार ने बुलाया। फिलिप आना नहीं चाहते थे। जबकि नोरा की भारत में दिलचस्पी थी। जिसके कारण उन्होंने फिलिप को मनाया और वे लाहौर गए और फिर यहीं से पंजाबी रंगमंच की शुरूआत हुई। नोरा का मानना था कि थियेटर में ऐसी पावर है जिससे समाज को बदला जा सकता है। उनका मानना था कि थियेटर से लोगों तक पहुंचा जा सकता है। नोरा का मानना था कि हर इंसान को थियेटर करना चाहिए।