चंडीगढ़ के पंजाब कला भवन में नाटक मिर्जा के जरिए किसानों के दर्द से लोगों को वाकिफ कराया गया। इसका निर्देशन गुरचरण सिंह ने किया। नाट्य रूपांतरण बलविन्द्र बुलेट ने किया। नाटक को पटियाला के नयति थिएटर ग्रुप के कलाकारों ने पेश किया।
इस नाटक की कहानी रणबीर सिंह नाम के एक छोटे किसान के इर्द-गिर्द घूमती है, जो खुद को मिर्जा जट्ट समझता है और बड़े किसानों की तरह व्यवहार करता है। एक दिन उसके गांव में पानी की भयंकर समस्या आ जाती है जिसके कारण उसकी फसल सूख जाती है।
अपनी फसल को बचाने और पानी की कमी को पूरा करने के लिए वह ट्यूबवेल लगवाने के बारे में सोचता है। पैसे न होने की वजह से वह एजेंट के जरिए बैंक से कर्जा लेता है और टयूबवेल लगवाता है। इसके बाद वह अपनी सारी जमीन गिरवी रख कर और कर्ज लेता है।
कर्ज के पैसों से वह बड़ा ट्रैक्टर लेता है, घर को दोबारा बनाता है और बच्चों को सरकारी स्कूल से प्राइवेट स्कू ल में दाखिला दिलवा देता है। उसे पूरी उम्मीद है कि फसल कटने के बाद वह सारा कर्ज लौटा देगा।
कुछ समय तो उसका आराम से गुजरता है लेकिन बाद में रणबीर को कर्ज दिलाने वाला ऐंजट तंग करने लगता है तो कभी नेता। वहीं फसल काटने के समय उसे पता चलता है कि उसकी फसल तो कीटनाशक के अधिक छिड़काव की वजह से बर्बाद हो गई है।
खुद को मिर्जा जट्ट समझने वाले रणबीर को जिंदगी की कड़वी सच्चाई का सामना करना पड़ता है तो वह खुद को संभाल नहीं पाता और आत्महत्या करने की ठान लेता है। इसी दौरान वह सपने में देखता है कि उसके मरने के बाद घरवाले मातम मना रहे हैं। सबकी समस्याएं और भी बढ़ गई हैं। नींद टूटते ही वह आत्महत्या न करने का फैसला लेता है। इसके बाद वह दोबारा से नए तरीके से अपनी जिन्दगी की शुरुआत करता है और आम किसान की जिन्दगी जीने लगता है। यहीं कहानी का अंत हो जाता है।