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लिटरेचर फेस्ट के जुटे लेखन की दुनिया के प्रबुद्ध

Sun, 21 Dec 2014 02:58 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, पंचकूला
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साहित्य प्रेमियों, लेखक और कॉरपोरेट जगत में नया मुकाम हासिल कर चुके प्रबुद्ध शनिवार को पंचकूला में एक प्लेटफॉर्म पर जुटे। मौका था सेक्टर-चार स्थित सतलुज पब्लिक स्कूल में शुरू हुए पंचकूला लिटरेचर फेस्ट (पीएलएफ)का। इसका आयोजन रयूमर बुक्स इंडिया ने किया है। दो दिवसीय इस साहित्यक आयोजन में साहित्य क्षेत्र के 40 जाने माने साहित्यकार शामिल हुए हैं।
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इसमें यंग इंडियंस (वाई) और कॉन्फेडरेशन ऑफ इंडियन इंडस्ट्री (सीआईआई) की भी सहभागिता रही। उत्तरी क्षेत्र के 100 प्रमुख स्कूलों के स्टूडेंट्स भी इसमें शामिल हुए। इन्हें लेखन कौशल के लिए लेखकों ने प्रेरित किया। फेस्टिवल का उद्घाटन पंचकूला के उपायुक्त विवेक अत्रे ने किया। इस मौके पर सीबीएसई के क्षेत्रीय निदेशक आरजे खांडेराव, गायिका डॉली गुलेरिया भी शामिल हुईं।

अपने संबोधन में उपायुक्त ने कहा कि लेखन से मुझे असीम आनंद मिलता है। मैं आत्मिक संतोष के लिए लिखता हूं और उसे सोशल मीडिया पर शेयर भी करता हूं। हमें याद रखना होगा कि लेखन एक कलात्मक अभिव्यक्ति है और एक बार प्रकाशित होने के बाद वह स्थायी हो जाता है। उपायुक्त ने कहा कि इन दिनों पहले की तुलना में कम लोग लेखन कर रहे हैं।
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कुछ ऐसे भी हैं जो गुपचुप तौर पर ही कविताएं लिख रहे हैं। हमें अपने काम को प्रकाशित करवाने में कोई संकोच नहीं करना चाहिए। पीएलएफ के चेयरमैन रीकृत सेराय ने कहा कि पीएलएफ का दूसरी बार आयोजन किया जा रहा है। इसमें पहले की तुलना में अधिक सहभागिता हुई है।

फिक्शन और फैक्ट्स पर हुई चर्चा
पीएलएफ के पहले दिन विरोधाभासी तथ्यों और कथा कल्पना पर एक आकर्षक सत्र की शुरुआत हुई। इसकी अध्यक्षता राकेश गोधवानी ने की। इस सत्र के पैनलिस्टों में जाने माने लेखक साद बिन जंग, क्रिस्टोफर डॉयल और जाने माने पत्रकार रमेश मेनन शामिल हैं। सभी पैनलिस्ट ने तथ्यों की विवेचना अपने-अपने अंदाज में की।

साद ने तथ्यों और कल्पना के बीच एकसमानता को उकेरने का प्रयास किया, तो क्रिस्टोफर ने जोर देते हुए कहा कि दोनों को अलग करने वाली रेखा बेहद सूक्ष्म हैं। क्रिस्टोफर सी डॉयल ने भारतीय और अंतरराष्ट्रीय प्रकाशनों के लिए प्रबंधन और कारोबार पर निबंध लिखे हैं।

फिल्मों और लेखन पर परिचर्चा
लिटरेचर फेस्ट के दौरान एक सत्र में फिल्म और लेख पर चर्चा हुई। इस मौके पर लेखक फाहद समर और केतन भगत ने एक-दूसरे के विपरीत विचार रखे। फाहद का विचार था कि सिनेमा एक सुविधाजनक वाहक है और लोग कला के इस हिस्से को देखना और अच्छे लिखे को पढ़ना चाहते हैं।

महान विचारकों और लेखकों के काम को हमेशा ही सराहना मिलती है। समय के साथ उन्हें फिल्मों के तौर पर पर्दे पर प्रस्तुत किया जाता है। दूसरी ओर, केतन के मुताबिक यह एक व्यावसायिक दुनिया है और ये एक ऐसा उद्योग है, जिसे बाजार के आयाम आगे संचालित करते हैं। फिल्म निर्माता वही बनाते हैं, जो बिकता है और जो दर्शक देखना चाहते हैं।

साद की माटोबेले डॉन का विमोचन
इस मौके पर साद बिन जंग की नई किताब माटाबेले डॉन का विमोचन भी किया गया। इसके बाद लेखक के साथ एक बातचीत का सत्र भी रखा गया। इसकी अध्यक्षता सुदीप सेन ने की। ये किताब एक ऐतिहासिक यात्रा का वृत्तांत है और ये एक रोमांचक सफर पर ले जाती है। इसकी कहानी 1840 के समय से शुरू होती है।


इसमें अफ्रीका की जनजाति के जीवन को भी शानदार तरीके से पेश किया गया है। इसका समापन 1940 में एक नवाब की कहानी बताने के साथ होता है। इस किताब के बारे में साद ने कहा कि यह एक कहानी के बीच एक कहानी के समान है। इसमें कई कहानियां आपस में पिरोई हुई हैं।
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