‘मेरे पास अल्फाज नहीं हैं कि मुझे आज कितना सुकून मिला है। मैं 67 सालों से अपनी जन्म स्थली को देखने के लिए बेताब था। मैं देखना चाहता था कि क्या वहां आज भी वही गलियां हैं... बच्चे इन गलियों में आज भी वैसे ही खेलते हैं... जब दो भाई (हिंदुस्तान व पाकिस्तान) अलग नहीं हुए थे।’
पाकिस्तान के लाहौर से अपनी जन्म स्थली हरियाणा के हिसार के गांव प्रभुवाला आए राव शमशुद्दीन खान ये सब कहते हुए फफक पड़े। आंखों में झलके आंसू पोंछते हुए उन्होंने कहा कि इस जन्म भूमि पर आकर उनका वर्षों का सपना पूरा हो गया। अपनी जन्म भूमि को देखने के लिए वर्षों से प्रयास कर रहा था। आखिर जिस भूमि पर मेरा जन्म हुआ वह हिंदुस्तान मेरा भी तो है। उन्होंने बताया है कि जब हिंदू-मुस्लिम के दंगे हुए और मुस्लिम देश छोड़कर पाकिस्तान जा रहे थे उस वक्त का हर पल उनकी आंखों में आज भी तैरता है।
कोर्ट कांप्लेक्स स्थित एडवोकेट लाल बहादुर खोवाल के चैंबर में बैठे राव शमशुद्दीन ने बताया है कि जब दंगा हुआ तो वह सात वर्ष के थे। प्रभुवाला से मुस्लिम समुदाय के लोग बैलगाड़ियों में साहू गांव की तरफ से निकलने लगे। रेलवे लाइनों पर हिंदू-मुस्लिमों का आपस में कत्लेआम हुआ। कई लोग अच्छे भी थे। उन्होंने उन्हें दूसरी तरफ से निकाला और वे गैबीपुर से होते हुए फिर डिंग मंडी, सिरसा, फाजिल्का से होकर पंजाब में घुसे।