टैगोर थिएटर में चल रहे थिएटर फॉर पीस फेस्टिवल का बुधवार को समापन हो गया। अंतिम दिन कोलकाता की थिएटर आर्टिस्ट उषा गांगुली द्वारा निर्देशित नाटक ‘अन्ही माई दा सुफना’ का मंचन किया गया। यह नाटक भारत- पाक विभाजन से पीड़ित दो इंसानों की भावनाओं पर आधारित था, जो नाटक के अंत तक अपनी मिट्टी से जुड़ने के लिए तड़पते रहते हैं।
नाटक की शुरुआत पंड सुपनियां दी खोले कोई गीत से होती है। उसके बाद एक अंधी औरत माई जानकी का सीन आता है, जो बंटवारे के बाद अपने परिवार के साथ अमृतसर में रहने लगती है। लेकिन उसका दिल वापस अपने वतन, अपने घर जाने की राह देखता रहता है। लेकिन वीजा के झंझट में उसका बेटा उसके सपने को साकार करने में नाकामयाब रहता है। मां की पीड़ा देखकर माई जानकी का बेटा अमृतसर केपास के गांव को पाकिस्तान कहकर उसे वहां ले जाता है। वह यहीं सोचता रहता है कि माई तो अंधी है उसे कुछ पता नहीं चलेगा।
यहां तक कि वह जिस गांव में अपनी मां को लेकर जाता है वहां के लोगों को पाकिस्तानी अंदाज में बोलने का आग्रह करता है ताकि माई को शक न हो। लेकिन अंत में माई को सब पता चल जाता है कि उसकी इच्छा पूरी करने के लिए उसके बेटे ने उससे झूठ बोला। अंत में वह अपने बेटे को बिना कुछ बताएं यह शब्द करहती है- मैं तां रोज सुफने वेखदी सां। पर जिहड़ा सुफना तूं मैंनू दिखाया ओह मैंनू सब तो सोहणा लगा।