बता दें कि पूर्व सीएम बादल द्वारा पद्म विभूषण वापस करने की घोषणा के कुछ मिनट बाद ही विरोधी गुट के सुखदेव सिंह ढींढसा ने पद्म भूषण सम्मान वापस करने की घोषणा कर दी। बादल परिवार से छिटक चुके पंथक वोट बैंक पर अपनी पकड़ बनाने के लिए ढींढसा ने सम्मान वापस कर एसजीपीसी व विधानसभा चुनाव में शिअद (लोकतांत्रिक) के रूप में एक बार फिर बादल परिवार का विकल्प पेश कर दिया है।
ढींढसा के बेटे व विधायक परमिंदर सिंह ढींढसा जिस प्रकार किसान आंदोलन के समर्थन में उतरे हैं, इससे स्पष्ट है कि प्रदेश में शिअद (बादल) व शिअद (लोकतांत्रिक) के बीच पंथक वोटों को अपने-अपने पक्ष में करने की लड़ाई तेज हो गई है।
दोनों अकाली नेताओं द्वारा लौटाए गए सम्मान का पंथक वोट बैंक पर क्या प्रभाव पड़ेगा, इसका पता तो एसजीपीसी चुनाव परिणाम से लगेगा। लेकिन यह स्पष्ट है कि बादल की इस चाल पर ढींढसा ने पलटवार कर दिया है। सुखबीर बादल द्वारा पंथक वोट बैंक की सहानुभूति पाने को बिछाई बिसात में ढींढसा ने अपना सियासी पासा चला है। ढींढसा के इस अप्रत्याशित कदम ने सिख राजनीति को एक नई दिशा की तरफ मोड़ दिया है। किसानों के इस संघर्ष में शिअद को अभी तक कोई भी सियासी लाभ मिलता दिखाई नहीं दे रहा है। केंद्र सरकार से इस्तीफा देने के बाद शिअद ऐसी स्थित में नहीं है कि वह किसान संघर्ष में अपनी भूमिका निभा सके।